छत्तीसगढ़

शासकीय प्राथमिक विद्यालय शुक्लाभाठा में मनाया गया हरेली तिहार 

गरियाबंद_जिले के मैनपुर ब्लाक अंतर्गत आने वाले ग्राम शुक्लाभाठा शासकीय प्राथमिक विद्यालय में मनाया गया हरेली तिहार बच्चों को दी गई हरेली तिहार की संपूर्ण जानकारी साथ ही एक पेड़ मां के नाम लगाकर दिया हरियाली का संदेश सावन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को हरियाली अमावस्या चितलागी अमावस्या हरेली त्यौहार के रूप में मनाया जाता है यह त्यौहार हमारे छत्तीसगढ़ राज्य में बड़े ही उमंग व उत्साह से मनाया जाता है इस समय तक खेती कार्य मे खरीफ फसल की प्रारंभिक कार्य जैसे धान की बुआई तथा रोपा आदि का कार्य लगभग सम्पन्न हो चुका रहता है इसलिए किसान मजदूर भाई इस दिन प्रातःकाल अपने गोधन गाय बैल भैंस आदि को अच्छे से नहला धुला कर पूजा करते हैं तथा गेहूं के आटे को गूँथ कर उसमें खड़ा नमक डाल कर गोल गोल बनाकर अंडी या खम्हार पेड़ के पत्ते में लपेट कर समस्त गोधन को खिलाते है इसका मुख्य उद्देश्य अपने गोधन को किसी भी तरह के वायरस जीवाणु कीटाणु आदि के रोगों से बचाना होता है घर की माताएं बहने अपने पूरे घर व कच्ची दीवारों को गोबर से लिपाई करती हैं ग्रामीण क्षेत्र में घर के दीवारों पर गोबर से हनुमान जी भी बनाते है गांव के नियुक्त पौनी पसारी जैसे नाई राउत व बैगा हर घर के दरवाजे पर नीम की डाली लगाते है गांव के समस्त ग्राम देवी देवताओं में धूप दीप दिखाते हैं और प्रसाद के रूप में समस्त ग्रामवासियों को दसमुल कांदा व बन गोंदली का वितरण करते है इसका मुख्य उद्देश्य गांव के हर सदस्य को बुरी नजरों व किसी भी तरह की बिमारियों से बचाना होता है चूंकि इस समय बरसात होते रहने के कारण जगह जगह पानी भरे रहने के कारण कई तरह के कीटाणु मच्छर आदि से संक्रमित बीमारियों के बढ़ने का खतरा रहता है उपरोक्त्त सेवा कार्य के बदले में नाई राउत व बैगा को सम्मान पूर्वक सेर सीधा आदि दक्षिणा दिया जाता है पहले के समय में सावन मास के कृष्ण पक्ष को अनिष्ट कारक माना जाता था इसलिए ग्रामीण जनमानस अपने घर गोधन तथा परिवार समाज के समस्त जनों को किसी भी तरह के अनिष्ट कारक शक्तियों से बचाने के लिये ग्राम देवी देवताओं की पूजा कर विभिन्न तरह के टोने टोटके द्वारा रक्षा का उपाय किया जाता था इस तरह अपने घरों की साफ सफाई के बाद गृहणियां अपने चूल्हे चौके में कई प्रकार के छत्तीसगढी व्यंजन बनाने में लग जाती है और गोधन की स्नान सेवा पूजा आदि कर लेने के बाद पुरुष वर्ग अपने खेती कार्य में उपयोग होने वाले समस्त औजारों नागर कोप्पर दतारी टँगीया बसूला रापा कुदारी सब्बल गैंती आदि को साफ धोकर एक जगह मुरुम के ऊंचा आसन बनाकर रखते है फिर स्वयं स्नान आदि कर लेने के बाद उपरोक्त समस्त औजारों की भावपूर्वक पूजन करते है जिसमें छत्तीसगढ़ी व्यंजन गुलगुला भजिया व गुड़हा चीला का भोग लगाते है फिर अपने गांव घर के सभी नये विवाहित बेटियों तथा मानदानो को सम्मान पूर्वक बुलाकर साथ मे भोजन करते हैं बच्चों के लिये गेड़ी बनाकर उनकी भी पूजा किया जाता है फिर चढ़ने के लिये दे दिया जाता है युवा वर्ग बैल दौड़ कबड्डी चर्रा नारियल फेंक आदि कई तरह के खेल खेलते हैं बहु बेटियां भी नया साड़ी पहन पूरे सोलह सिंगार करके सामूहिक रूप से सावन झूला बिल्लस खो खो आदि खेल का आनन्द लेते है इस तरह हरेली का त्यौहार ग्रामीण जनमानस के लिये पूर्णत प्रकृति की ही पूजा है जिसे प्राचीन परम्परा और रीति रिवाज बनाकर अच्छे से निभाया जाता है। यह त्यौहार अपनों के साथ आपस मे मिल जूलकर रहने का संदेश देता है।

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