मंथरा-कैकई संवाद और दशरथ के विलाप ने दर्शकों को किया भावुक
October 12th, 2026 | Post by :- | 28 Views

गजसिंहपुर,(यश कुमार)। श्री महावीर ड्रामेटिक क्लब के मंच पर आयोजित लीला में सोमवार को राम वनवास प्रसंग का भावपूर्ण मंचन किया गया। राजा दशरथ द्वारा भगवान श्रीराम के राजतिलक की घोषणा से अयोध्या में खुशियों का माहौल बनता है, लेकिन मंथरा के षड्यंत्र और कैकई के दो वरदानों के कारण यह खुशी दुख में बदल जाती है। मंथरा-कैकई संवाद, कैकई के कोपभवन में बैठने और राजा दशरथ-कैकई के बीच हुए संवादों ने दर्शकों को भावुक कर दिया। लीला में राजा दशरथ द्वारा भगवान श्रीराम को अयोध्या का राजा बनाने के लिए राजतिलक की घोषणा का सुंदर मंचन किया गया। राम के राजतिलक की खबर से अयोध्या में उत्सव का वातावरण बन जाता है। दूसरी ओर, मंथरा इस निर्णय से चिंतित होकर कैकई को अपने षड्यंत्रपूर्ण विचारों से प्रभावित करती है और भरत को राजा बनाने के लिए उकसाती है। मंथरा की बातों में आकर कैकई कोपभवन में चली जाती है। जब राजा दशरथ कैकई को मनाने पहुंचते हैं, तो वह उन्हें पूर्व में दिए गए दो वरदानों की याद दिलाती है। कैकई राजा दशरथ से पहला वरदान भरत के राजतिलक और दूसरा वरदान भगवान श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांगती है। कैकई की मांग सुनकर राजा दशरथ स्तब्ध रह जाते हैं। एक ओर पुत्र राम के प्रति उनका अपार स्नेह और दूसरी ओर अपने वचन को निभाने की विवशता का मार्मिक दृश्य प्रस्तुत किया गया। दशरथ-कैकई संवाद में राजा दशरथ की व्याकुलता और कैकई के अपने निर्णय पर अडिग रहने के प्रसंग ने दर्शकों को भावुक कर दिया। राजा दशरथ द्वारा वचन दिए जाने के बाद भगवान श्रीराम को वनवास के निर्णय की जानकारी मिलती है। श्रीराम पिता के वचन की मर्यादा बनाए रखने के लिए वन जाने को तैयार हो जाते हैं। इसके बाद वे अपनी माता कौशल्या से विदाई लेने पहुंचते हैं। माता कौशल्या और श्रीराम के बीच विदाई का दृश्य अत्यंत भावपूर्ण रहा। श्रीराम का शांत स्वभाव, माता के प्रति सम्मान और पिता के वचन का पालन करने का संकल्प दर्शकों को मर्यादा, त्याग एवं कर्तव्य का संदेश देता है। लीला में राजा दशरथ की भूमिका मंगत राम शर्मा, कैकई की शिवचरण, भगवान श्रीराम की बालकिशन गिरधर, माता कौशल्या की सोनू काठपाल तथा मंथरा की भूमिका संदीप लिम्बा ने निभाई। कलाकारों ने अपने संवादों एवं भावपूर्ण अभिनय से राम वनवास प्रसंग को जीवंत बना दिया। श्रीराम के वनवास की भूमिका ने दर्शकों को यह संदेश दिया कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य, वचन और कर्तव्य की मर्यादा का पालन करना भारतीय संस्कृति के प्रमुख आदर्श हैं।

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