मनुष्य सांसारिक सुख मिलने के पश्चात परमात्मा को कहीं पीछे छोड़ देता है:सुमान्या भारती
लोकहित एक्सप्रेस,Yamunanagar ।20 मार्च, 2026 व्यासपुर ग्राम सलेमपुर बांगर नज़दीक सरकारी स्कूल पंचायत घर में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा परम पूजनीय दिव्य गुरु आशुतोष महाराज जी के तत्वाधान में आयोजित तीन दिवसीय भगवान शिव कथा के अंतिम दिवस पर कथा व्यास साध्वी सुश्री सुमान्या भारती जी ने सभी नगर निवासियों को भारतीय नव वर्ष की हार्दिक बधाई देते हुए कथा को आरंभ किया। उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह प्रसंग का बहुत सुंदर शब्दों में वर्णन करते हुए कहा कि माता पार्वती भगवान शिव को पति रुप में पाने के लिए घोर तप करती हैं। भगवान शिव की अनुमति पाने के पश्चात सभी देवी देवता, शिव गण, भूत प्रेत भी भगवान शिव की बारात की शोभा बनते हैं। भगवान शिव सबसे पीछे और बारात आगे चल रही होती है। यह प्रसंग इस संसार की प्रवृत्ति को दर्शाता है कि प्रत्येक मनुष्य सांसारिक सुख मिलने के पश्चात परमात्मा को कहीं पीछे छोड़ देता है और वह क्षणिक सुख आनंद में इतना मग्न हो जाता है कि उसे भगवान की सुधि ही नहीं रहती। पर्वतराज हिमालय की पत्नी मैना भगवान शिव का ऐसा भयावह रूप देख कर मूर्छित हो जाती हैं और होश आने पर वे माता पार्वती का विवाह भगवान शिव से करने के लिए मना कर देती हैं। तब देवर्षि नारद मैना देवी को समझाते हैं कि माता पार्वती के रूप में उनके घर स्वयं शक्ति स्वरूपा माँ भवानी ने अवतार लिया है और शक्ति शिव से कदापि अलग नहीं हैं और शिव शक्ति के मिलन में कोई बाधक नहीं बन सकता क्योंकि संपूर्ण मानव जाति के लिए भगवान शिव और माँ पार्वती की यह दिव्य लीला अत्यंत कल्याणकारी सिद्ध होगी। देवर्षि नारद की कृपा से ही देवी मैना भगवान शिव और माँ पार्वती का वास्तविक स्वरूप देख पाती हैं जिसके पश्चात वे क्षमा याचना करती है और बड़े आनंदपूर्वक माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह संपन्न होता है। अब यहाँ हमें एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संदेश मिलता है कि हमारे अंतःकरण में आत्मा और परमात्मा को लेकर कई तरह के संशय और भ्रम रहते हैं जिनसे हम कई जन्मों तक मुक्त नहीं हो पाते परन्तु देवर्षि नारद जैसे गुरू जीवन में आते हैं तो उनकी कृपा से ही हमारी बुद्धि से माया एवं भ्रम का पर्दा हट जाता है और हम वास्तविकता को देख पाते हैं। तभी हमारी आत्मा का परमात्मा से मिलन संभव हो पाता है क्योंकि आत्मा कभी परमात्मा से अलग नहीं, केवल बीच में जो मन और माया का पर्दा है उसे हटाने का कार्य गुरु स्वयं करते हैं। गुरु के बिना हम इस जनम मरण के चक्रव्यूह से कदापि मुक्त नहीं हो सकते। कथा के अंतिम दिवस पर भगवान शिव की आरती और भजन संकीर्तन भी किया गया। अंत में भगवान शिव के चरणों में विश्व शांति की प्रार्थना के साथ कथा का समापन हुआ।





