मनोज शर्मा,चंडीगढ़। आर्य समाज, सैक्टर 7 बी, चण्डीगढ़ में वेद प्रचार सप्ताह के अन्तर्गत, श्रावणी पर्व धूमधाम से संपन्न हो गया है। इस सुअवसर पर आर्य जगत के सुप्रतिष्ठित विद्वान आचार्य राजू वैज्ञानिक ने प्रवचन के दौरान कहा कि वेद निष्पक्ष हैं। वेद के योगिक शब्दों के अर्थों का अंतर समझना अति आवश्यक है। इसमेंं रूढ़ि शब्द नहीं हैं। वेद में पुरुष का अर्थ जीवात्मा से है। वह शरीर में रहने वाला नगर का स्वामी है।
जीवात्मा न ही पुरुष और न ही महिला। पुरुष में सब कुछ आ जाता है। मनुष्य उन्नति के लिए पैदा हुआ है। उन्नति दो प्रकार की है प्रथम भौतिक और द्वितीय आध्यात्मिक उन्नति। केवल सांसारिक उन्नति को प्राप्त करके मुक्ति के पथ पर नहीं बढ़ा जा सकता। इसलिए सांसारिक सुखों को अंतिम सुख न माने। जीवन केवल भोजन के लिए हो तो यह सही नहीं है। इसलिए सांसारिक एवं आध्यात्मिक उन्नति अति आवश्यक है। उन्नति दोनों का समावेश है। दोनों की प्राप्ति केवल संयम से हो सकती है। जन्म- जन्मांतर की सिद्धि से आनंद की प्राप्ति होती है । संयम का अर्थ किसी भी प्रकार की अति में न डोलना। न योग की अति हो न भोग की अति हो। मूर्ख क्रियाओं का नाम तप नहीं है। जिस चीज की अति होती है,वह दुख का कारण बनती है। जिसकी इंद्रियां संयम में रहती है,उसकी बुद्धि स्थिर होगी।
भाषण-भक्षण पर नियंत्रण हो जाए तो अन्य नियंत्रण की आवश्यकता नहीं पड़ती है। झूठ न बोलें,किसी की निंदा न करें और कठोर बचन न बोले। कार्यक्रम से पूर्व पं.उपेन्द्र आर्य, भजनोपदेशक भजन प्रस्तुत करते हुए कहा – प्रभु हर दिल में बसता है वह जर्रे- जर्रे में समाया है,टंकारा से एक फरिश्ता वरदान बनकर आया आदि से उपस्थित लोगों को आत्म विभोर कर दिया। प्रातः कालीन कार्यक्रम यज्ञ ब्रह्मा आचार्य राजू वैज्ञानिक – दिल्ली यज्ञ सहयोगी-आचार्य अमितेश कुमार-पुरोहित द्वारा संपन्न कराया गया ऋषि लंगर के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।





