नगरपालिका अध्यक्ष व पार्षदों पर मुकदमों को लेकर सड़कों पर उतरी जनता, अधिशासी अधिकारी की कार्यशैली पर सवाल :  कांग्रेस ने उठाई निष्पक्ष जांच की मांग
October 12th, 2026 | Post by :- | 37 Views

गजसिंहपुर (यश कुमार)। गजसिंहपुर नगरपालिका में अध्यक्ष और पार्षदों के खिलाफ अधिशासी अधिकारी लाजपत बिश्नोई की शिकायत पर दर्ज मुकदमों का मामला अब प्रशासनिक विवाद से निकलकर बड़े राजनीतिक टकराव का रूप लेता नजर आ रहा है। सोमवार को बाजार बंद के आह्वान के बीच शहर की जनता और व्यापारियों के सड़कों पर उतरने से सियासी माहौल गरमा गया। अधिशासी अधिकारी की कथित हठधर्मिता के विरोध में उठी आवाज अब डबल इंजन सरकार के स्थानीय नेताओं के लिए भी राजनीतिक चुनौती बनती दिखाई दे रही है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब जनता अपने चुने हुए नगरपालिका अध्यक्ष और पार्षदों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को लेकर निष्पक्ष जांच की मांग कर रही है, तब सत्ताधारी भाजपा के स्थानीय नेता जनता के साथ खड़े होने के बजाय बाजार बंद से दूरी क्यों बनाते नजर आ रहे हैं। बाजार बंद को लेकर भाजपा की ओर से बाजार खुला रखने के लिए पुलिस संरक्षण मांगे जाने की बात सामने आने के बाद राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। दूसरी ओर व्यापारियों और आमजन का एक वर्ग अधिशासी अधिकारी की कार्यशैली के विरोध में सड़कों पर उतर आया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर भाजपा के स्थानीय नेता किसके साथ खड़े हैं जनता की आवाज के साथ या प्रशासनिक अधिकारियों के पक्ष में ? नगरपालिका में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारी के बीच पैदा हुआ विवाद अब गजसिंहपुर की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बनता दिखाई दे रहा है।  गजसिंहपुर नगरपालिका में कांग्रेस का बोर्ड बनने और संदीप पेड़ीवाल के अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद जिस प्रकार अध्यक्ष सहित पार्षदों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए, उसे लेकर कांग्रेस खेमे में नाराजगी है। कांग्रेस पक्ष इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर बताते हुए एफआईआर की निष्पक्ष जांच की मांग उठा रहा है। वहीं राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या नगरपालिका में निर्वाचित बोर्ड और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच टकराव को बातचीत से सुलझाने के बजाय पुलिस मुकदमों तक पहुंचाना जरूरी था? हालांकि मुकदमों के पीछे राजनीतिक दबाव होने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन इस घटनाक्रम ने स्थानीय प्रशासन की निष्पक्षता को लेकर बहस जरूर छेड़ दी है। आगामी पंचायत चुनावों को देखते हुए गजसिंहपुर का यह विवाद भाजपा के स्थानीय नेतृत्व के लिए नई चुनौती बन सकता है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अब यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि जो नेता नगरपालिका के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के मामले में जनता की भावनाओं के साथ खड़े नहीं दिखाई दे रहे, वे आगामी पंचायत चुनावों में जनता के बीच जाकर किस आधार पर समर्थन मांगेंगे? एक तरफ डबल इंजन सरकार विकास और सुशासन के दावे करती है, दूसरी तरफ गजसिंहपुर में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच चल रहा विवाद इन दावों की जमीनी तस्वीर पर सवाल खड़े कर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में गजसिंहपुर पुलिस की कार्यशैली को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। मनरेगा मजदूरों की ओर से अधिशासी अधिकारी के व्यवहार को लेकर दी गई शिकायत पर कथित रूप से अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने, जबकि अधिशासी अधिकारी की शिकायत पर नगरपालिका अध्यक्ष और पार्षदों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने से असंतोष बढ़ा है। सवाल यह है कि क्या पुलिस दोनों पक्षों की शिकायतों को समान गंभीरता से देख रही है? क्या जांच पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष होगी या राजनीतिक दबाव के आरोपों के बीच पुलिस की भूमिका पर सवाल बने रहेंगे? इन सवालों का जवाब पुलिस प्रशासन को अपनी पारदर्शी कार्रवाई से देना होगा। अब जनता के आक्रोश को नजरअंदाज करना आसान नहीं! गजसिंहपुर का बाजार बंद केवल एक अधिकारी के विरोध तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला अब निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के सम्मान, प्रशासनिक जवाबदेही और जनता की आवाज से जुड़ता जा रहा है। कांग्रेस जहां निष्पक्ष जांच की मांग के साथ इस मुद्दे पर सक्रिय दिखाई दे रही है, वहीं भाजपा के स्थानीय नेताओं के रुख पर राजनीतिक सवाल उठ रहे हैं। अब देखना यह होगा कि डबल इंजन सरकार गजसिंहपुर के इस विवाद का समाधान निकालकर जनता का विश्वास जीतती है या फिर नगरपालिका से शुरू हुआ यह टकराव आगामी पंचायत चुनावों में भाजपा के लिए राजनीतिक मुश्किलों का कारण बनेगा। फिलहाल गजसिंहपुर की सड़कों से उठ रही आवाज सत्ता और प्रशासन दोनों के लिए एक स्पष्ट संदेश है। जनता के सवालों का जवाब देना होगा, केवल मुकदमों और पुलिस संरक्षण से जनभावनाओं को शांत नहीं किया जा सकता।

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