पीलीभीत में अपनों का विरोध और गुटबाजी बीजेपी के लिए बनी चुनौती, समाजवादी पार्टी को मिल सकता है फायदा
September 7th, 2026 | Post by :- | 17 Views
पीलीभीत में अपनों का विरोध और गुटबाजी बीजेपी के लिए बनी चुनौती, समाजवादी पार्टी को मिल सकता है फायदा

​पीलीभीत। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। हाल ही में भाजपा छोड़ समाजवादी पार्टी का दामन थामने वाले नेताओं के कारण जिले के चुनावी समीकरण बिगड़ते नजर आ रहे हैं। वहीं, पीलीभीत सदर सीट से लगातार दो बार के भाजपा विधायक और राज्य मंत्री संजय सिंह गंगवार के खिलाफ स्थानीय स्तर पर पनपा भारी असंतोष पार्टी के लिए सबसे बड़ी सिरदर्दी बन गया है।
​जीत का घटता अंतर और अपनों से खिंची तलवारें
2017 में प्रचंड मोदी लहर के बाद 2022 के चुनाव में संजय सिंह गंगवार महज 6 हजार वोटों के अंतर से ही जीत दर्ज कर सके थे। वर्तमान में उनके प्रति कार्यकर्ताओं, संगठन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों में गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है।
​सूत्रों के मुताबिक, मंत्री संजय गंगवार से उनकी अपनी कुर्मी बिरादरी के बड़े चेहरे भी दूर हो चुके हैं। इनमें पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष सुरेश गंगवार और जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष सत्यपाल गंगवार के नाम प्रमुख हैं। इसके अलावा जिले की दो नगर पालिका और तीन नगर पंचायतों के अध्यक्षों से भी मंत्री के रिश्ते बेहद खराब दौर में हैं।
​कमीशनखोरी और शिकायत की राजनीति का आरोप
स्थानीय राजनीति में चर्चा है कि विकास कार्यों और कमीशनखोरी के बंटवारे को लेकर हुई तनातनी में मंत्री ने कई चेयरमैन व चेयरपर्सन की शिकायतें अपने लेटर पैड पर शासन से की थीं। अपनों के खिलाफ ही मोर्चा खोलने की यह रणनीति अब उनके खुद के लिए नुकसानदेह साबित हो रही है। स्थानीय स्तर की इस गुटबाजी को भुनाने के लिए समाजवादी पार्टी पूरी तरह से ग्राउंड पर सक्रिय हो चुकी है।
​जिले का पुराना मिथक और भाजपा के सामने धर्मसंकट
पीलीभीत की राजनीति में एक मिथक सालों से चला आ रहा है—‘जो नेता जिले से सरकार में मंत्री बना, वह दोबारा विधायक नहीं चुना गया।’ राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा 2027 में पुनः संजय सिंह गंगवार को टिकट देती है, तो क्या वे इस बरसों पुराने मिथक को तोड़ पाएंगे? वहीं दूसरी ओर, यदि पार्टी प्रत्याशी बदलती है, तब भी स्थानीय स्तर पर जारी अंतर्कलह का असर परिणाम पर पड़ सकता है।
​फिलहाल, भाजपा से सपा की ओर होता पलायन और अंदरूनी खींचतान ने समाजवादी पार्टी के रास्ते को आसान बना दिया है। अंतिम फैसला पीलीभीत की जनता के हाथ में है, लेकिन यह अंदरूनी गुटबाजी भाजपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा कर रही है।

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