श्रीमद्भागवत प्रवचन – श्री राधेशनन्दन प्रभुजी
March 16th, 2020 | Post by :- | 21 Views

*🌹जय श्री हरि🌹*             *🌹जय श्री हरि🌹*
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*’॥श्रीमद्भागवत प्रवचन – श्री राधेशनन्दन प्रभुजी।।*

*मंगलाचरण*

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_अब माहात्म्य के प्रसंग प्रवेश करते हैं। श्रीमद्भागवत में बारह स्कन्ध है, अठारह हजार श्लोक हैं। इसका पूर्ण रूप से विवेचन प्रायः असम्भव है। क्योंकि इस पर जितना विवेचन किया जाए वह कम ही है। यद्यपि श्रीमद्भागवत का प्रत्येक शब्द ही महत्त्वपूर्ण है, तथापि जो हमारे लिए उपयोगी है, जिसे सरलता से हम अपने जीवन में उतार सकते हैं हम उसी पर विचार करेंगे। सार की बात ग्रहण करनी चाहिए। यहाँ अनेक विषय तथा अनेक कथाएँ पुनः-पुनः दोहरायी गयी हैं, परन्तु हम तो सारतत्त्व ही ग्रहण करते चलेंगे।_

*सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे।* *तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः।।*

_यहाँ कहा हम सब भगवान श्रीकृष्ण को नमस्कार करते हैं। जब किसी को नमस्कार करने के लिए कहा जाता है, तो हम सोचते हैं कि नमस्कार क्यों करें? उनमें ऐसी क्या विशेषता है? जिसे हम बड़ा नहीं समझते उसे नमस्कार नहीं कर पाते। तो बोले- भगवान सच्चिदानन्द स्वरूप है, इसलिए। ‘होंगे! उससे हमें क्या मिला? तो कहा – केवल यही बात नहीं है ‘तापत्रय’ विनाशाय’ आधिदैविक आध्यात्मिक और आधिभौतिक – इस प्रकार हमारे कष्ट, ताप-संताप तीन प्रकार के होते हैं। आध्यात्मिक ताप- शरीर से, मन से होने वाली बीमारियाँ आध्यात्मिक ताप के अन्तर्गत आती हैं। आधिभौतिक ताप- आस-पास के वातावरण से प्राप्त अशान्ति को, दुःख आधिभौतिक ताप कहते हैं। आधिदैविक ताप- अज्ञात स्रोत के कारण होने वाली दुःखद घटनाओं से प्राप्त ताप को आधिदैविक ताप कहते हैं। भगवान ऐसे आनन्दस्वरूप नहीं हैं, जो स्वयं तो आनन्द में बैठें और दूसरों को दुःखी रखें। उन्हें पूर्णतः समझ लेने पर ज्ञात होगा कि भगवान हमारा अपना ही स्वरूप है, सच्चिदानन्द स्वरूप हैं। ऐसे सच्चिदानन्द स्वरूप भगवान हमारे सारे तापों को नष्ट कर देते हैं। हम दो ही चीजें चाहते हैं।_

_सुख प्राप्ति और दुःख की समाप्ति। ये दोनों ही कार्य भगवान करते हैं। उनकी दूसरी विशेषता यह है कि वे ‘विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे’। वे सारे विश्व की उत्पत्ति के कारण हैं। जगत् में कोई बढ़िया चित्र बनाता है या सुन्दर गीत गाता है तो हम उसकी कितनी तारीफ करते हैं समस्त विश्व को देखें तो हमारी बुद्धि चकरा जाती है। कोयल अत्यंत मीठे स्वर में कूजती है। वह कौन है जिसने उसके कण्ठ में इतनी मधुर आवाज भर दी? उसे देखकर यदि हमारा मस्तक झुकता नहीं तो बड़े आश्चर्य की बात है। यह तो मूढ़ता और दुष्टता का ही परिचायक है। भगवान का सच्चिदानन्द रूप – शास्त्रीय भाषा में उनका स्वरूप लक्षण है। और विश्व की उत्पत्ति का कारणत्व – उनका तटस्थ लक्षण है। श्रीकृष्ण हमें बलात आकर्षित करते हैं। उनसे यह देखा नहीं जाता कि जीव उनसे अलग हो गया है, दुःख में पड़ा है और रो रहा है। इसलिए अनेक प्रकार की लीलाएँ करके वे हमारे हृदय को आकर्षित करते हैं। ऐसे श्रीकृष्ण को बार-बार नमस्कार! इसके बाद हम भगवान शुकदेव जी को नमस्कार करते हैं। भागवत के अनेक वक्ता और श्रोता हुए हैं परन्तु शुकदेव जी के समान कोई वक्ता नहीं हुआ। श्रीमद्भागवत की गुरुपरंपरा में नारायण भगवान आदिगुरु हैं, उनके शिष्य हैं ब्रह्मा जी, ब्रह्मा जी के शिष्य हैं नारदमुनि, नारदजी के शिष्य हैं। भगवान वेदव्यास जी और व्यासदेव जी के शिष्य हैं श्री शुकदेव जी। शुकदेव जी का ऐसा विलक्षण प्रभाव है कि उनके आगमन पर बड़े-बड़े महर्षियों की सभा में भी सब-के-सब उठकर खड़े हो जाते हैं। स्वयं व्यास भगवान भी खड़े हो जाते हैं।, यद्यपि शुकदेव जी आयु में सबसे छोटे सोलह वर्ष के हैं।_

*यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव।*
*पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु- स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि।।*

_वर्णन आता हैं (स्कन्द, पुराणादि में) कि भगवान शुकदेवजी जब माँ के गर्भ में थे तो गर्भ से निकलना ही नहीं चाहते थे। दस महीने हो गये, एक साल हो गया, बारह वर्ष हो गए तो भी बाहर नहीं आए। परेशान होकर माँ ने वेदव्यास जी से कहा तो भगवान वेदव्यास जी कहते हैं, ‘‘ माँ को बहुत कष्ट हो रहा है, तुम बाहर आ जाओ।’’ तो शुकदेव जी कहते हैं‘‘ नहीं भगवान की माया बहुत प्रबल है, बाहर आते ही फँसा लेती है। अतः मैं बाहर नहीं निकलूँगा।’’_
_गर्भ में हमें अपने स्वरूप का ज्ञान रहता है परन्तु बाहर आने पर उसकी विस्मृति हो जाती है। अतः शुकदेव जी कहते हैं वे आहर नही आएँगे। तो वेदव्यास जी ने कहा, ‘‘अच्छा, मैं तुमको आशीर्वाद देता हूँ कि माया तुम्हें नहीं सताएगी।’’ तब वे गर्भ से बाहर आए और माता-पिता को छोड़कर जाने लगे, क्योंकि उन्होंने ही आशीर्वाद दिया था माया नही फँसाएगी! शुकदेव जी जा रहे हैं, ‘अनुपेतमपेतकृत्यं’ उनके यज्ञोपवीत आदि कोई संस्कार नहीं हुए हैं।_
_जो नित्य शुद्ध हैं उन्हें संस्कारों की क्या आवश्यकता है। संस्कार तो अशुद्ध लोगों को दिए जाते हैं। प्रश्नोपनिषद में भगवान के लिए नाम आता है- ‘व्रात्य’। व्रात्य का अर्थ होता है संस्कारहीन। तो यहाँ भगवान को व्रात्य क्यों कहा? क्योंकि उन्हें सस्कार देने वाला कोई भी नहीं। वे ही सबको संस्कार देने वाले हैं। जिसका किसी से जन्म होता हो, जो असस्कारी हो, अशुद्ध हो उसी संस्कार देने की आवश्यकता है। नित्य-शुद्ध को क्या संसकार देना ?_
_शुक भगवान साक्षात् ब्रह्म हैं, वे जाने लगे तो- ‘द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव’ पुत्र के विरह में व्याकुल होकर द्वैपायन भगवान भी निकल पड़े और ‘पुत्रेति’ बेटा, बेटा कहकर पुकारने लगे। लेकिन देखो आश्चर्य यह है कि ‘तन्मयतया तरवोऽभिनेदुः’ शुकदेव जी प्राणिमात्र ऐसे एकरूप हो गये थे कि उनकी ओर से वेदव्यासजी को पेड़ों ने उत्तर दिया। इस प्रकार जो सर्वभूतात्मभूतात्मा हो चुके हैं ‘तं सर्वभूतहृदयं’ उन शुकदेव जी को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।_

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*💫⚘श्री राधेशनन्दन प्रभुजी💫⚘*