पाठकों के ढेरों पर्सनल मेसजेज़ आते हैं – “आप कौन हैं?” मानो पूछ रहे हों – “कहाँ से उतरी हैं ?”
February 18th, 2020 | Post by :- | 134 Views
पाठकों के ढेरों पर्सनल मेसजेज़ आते हैं – “आप कौन हैं?” मानो पूछ रहे हों – “कहाँ से उतरी हैं ?”

अनुपम सिंह द्वारा                         ……………

मैं भी मुस्कुरा देती हूँ। कहती हूँ – मैं भी आप लोगों की तरह, इसी धरती लोक पर वास करने वाली, एक आम इंसान हूँ। जन्म मिथिला में ज़रूर हुआ है, पर धरती फाड़ कर नहीं निकली। हवा में उड़ती ज़रूर हूँ, पर आसमाँ छेद कर प्रकट नहीं हुई। मेरे भी माता-पिता हैं, परिवार है, समाज में उठना बैठना है।

आज मैं अपने प्रारम्भिक जीवन का छोटा सा परिचय इस प्लाट्फ़ोर्म पर देना चाहूँगी। हर व्यक्ति की ज़िंदगी अपने आप में कई कहानियों का सम्मिश्रण होती है, एक छोटा हिस्सा आप लोगों के साथ साझा करना चाहूँगी ।

मेरा प्रारम्भिक जीवन:

वेदांत कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति इस दुनिया में जन्म लेने से पहले अपने माता-पिता को स्वयं चुनता है, ख़ुद अपने ही हाथों से इस नए जीवन का रेखा-चित्र खींचता है, और जो कार्य अधूरा छोड़ चल बसा था, उसे इस दफ़े पूर्ण करने की क़सम खाता है। इसीलिए अगर भूल से भी आपके मन में ये प्रश्न आ जाए, कि आप क्यों ऐसे माता-पिता की संतान हूँ, तो ख़बरदार! ये आरोप निराधार हैं। आपको अच्छी तरह पता होना चाहिए, कि आपने ही जन्म लेने के पहले इस जगत से परे जो सूक्ष्म जगत है, वहाँ पूरे होशो हवास में, अपने ही हक़ में ऐसा फ़ैसला लिया है।

मेरा भी दिन आया। बिहार के दरभंगा शहर के हिंदी के प्रोफ़ेसर हरि नारायण सिंह एवं श्रीमती मंजू मेहता के घर, मैंने भी एक दिन ख़ुद को, उनकी पुत्री के रूप में पाया। हिंदी फ़िल्मों में दिखने वाले एक ईमानदार प्रोफ़ेसर के सारे गुणों से सम्पन्न और कदाचार के विरुद्ध बेझिझक क़लम चलाने वाले मेरे पत्रकार पिताजी, अपनी जवानी में किसी दबंग सूपर हीरो से कम नहीं थे।

पापा का शुरुआती जीवन काफ़ी स्ट्रगल से भरा रहा है। खाने के भी लाले थे। सुबह खाया तो शाम को खा भी पाएँगे या नहीं, इसका अन्दाज़ लगा पाना मुश्किल होता था। आज़ादी की लड़ाई में अपनी जवानी क़ुर्बान कर देने वाले, स्वतंत्रता सेनानी, कलाकार और किसान के चार बेटों में से एक, मेरे पापा ऐसे बेटे थे, जिनमें पढ़ कर पढ़ाने और देश के लिए कुछ कर गुज़रने का हौसला कूट कूट कर भरा था। ख़ुद को तपाकर और तराशकर पापा ने अपना रास्ता ख़ुद बनाया था।

मेरा ननिहाल दरभंगा में ही था। सुना था मेरे बड़े मामा मेरी माँ से बहुत प्यार करते थे। वो जब पहली बार पापा को देखने उनके गाँव (मधुरा, अररिया, बिहार) गए थे, तो किसान के पुत्र, पापा को मिट्टी में सने हुए, हाथ में कुदाल लिए देखकर उलटे पाँव वापिस आ गए थे। कि नहीं, मेरी शहरी बहन की शादी मैं गाँव में नहीं कर सकता। लेकिन जोड़ियाँ तो ऊपर बनती हैं, धरती पर तो बस मिलन होता है।

समय बीतता गया। हमारा परिवार भी बढ़ता चला गया और माँ-पापा की जिम्मेदारियाँ भी। मेरे बाद मेरा भाई निलाभ परिमल, तत्पश्चात् मेरी बहन निरुपमा, और सबसे छोटा परिमल प्रसून। ये साहित्यिक नाम मेरे हिंदी के प्रोफ़ेसर पापा ने चुन चुन कर रखा था। पर मेरे बड़े मामा ने भी अपनी तरफ़ से नामकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। निलाभ बना खुरखुर भाई, निरुपमा कहलाई चींचीं और छोटा भाई मुन्ना भाई। हमारा परिवार सिर्फ़ छः लोगों का परिवार नहीं था।बचपन में ही एक बार पापा जब गाँव से आए तो अपने छोटे भाई की लड़की संगीता को भी साथ लाए थे। अनुपम के साथ साथ पढ़ लेगी, वरना भविष्य चौपट हो जाएगा।

मैं और बड़ी हुई तब तक चाची के भाई, बुआ का लड़का वग़ैरह वग़ैरह कई और लोग भी हमारे परिवार का हिस्सा बनते चले गए।। जब पूरे ख़ानदान में सिर्फ़ एक व्यक्ति पढ़ा-लिखा होता है, तो पूरे घर की आशाएँ और आकांक्षाएँ उस पर टिक जाती हैं। मैंने अपने भरे पूरे ददिहाल ख़ानदान के एकमात्र चिराग़, अपने पापा को हर एक की जिम्मेदारी आगे बढ़ कर लेते, और उन सब के लालन पालन के लिए संघर्ष करते हुए बहुत क़रीब से देखा है।

“सर, बेटा को घुमा रहे हैं?” “नहीं, बेटा नहीं है, बेटी है।” मुझे लड़कों के कपड़े पहनाकर, अपने साथ घुमाते हुए न जाने कितने ही लोगों ने ये सवाल मेरे पिताजी से किया होगा। बचपन से ही लड़की को लड़के की तरह बड़ा करने का जज़्बा लिए मेरे पापा ख़ूब तड़के उठकर पहले मुझे पढ़ाते थे, उसके बाद ही कॉलेज में प्राध्यापक का फ़र्ज़ निभाने जाते थे। पिटाई भी उतनी ही करते थे। घड़े का रूप जैसे कुम्हार की थाप से निकल आता है, वैसे ही मेरी प्रतिभा को निखारने के लिए थप्पड़- ठुकाई की भी पूरी व्यवस्था रहती थी। ये बात और है, मार-पीट कर के पढ़ा लेने के पश्चात्, अच्छे खान-पान एवं घूमने का बढ़िया पोस्ट-थेरपी ट्रीटमेंट पैकिज भी उपलब्ध कराया जाता था।

बचपन में मेरी माँ मुझसे अपनी बात मनवाने के लिए प्यार और अनुरोध दोनों का इस्तेमाल करती थीं पर मेरे पिताजी का ही घर में क़ानून चलता था। मेरे घर का शासन मानो राष्ट्रपति शासन। उनके स्कूटर की आवाज़ बालकनी से सुनते ही हम सब सावधान होकर अपनी अपनी किताबें लेकर बैठ जाते थे। अपनी किताबें यूँ पकड़ते थे जैसे किताब के अक्षरों से निकले ज्ञान रूपी मधु को पूर्णतया चट कर गए हैं। मेरी चचेरी बहन संगीता को तो एक बुक पहले लाइन से लेकर अंतिम लाइन तक पूरी की पूरी याद थी। पापा के आने की आहट होते ही उसे बिना बुक के पूरी किताब ज़ोर ज़ोर से बोलते हुए कई बार देखा था। मेरे पापा भी कितने मासूम थे। चौधरी भवन के फ़र्स्ट फ़्लोर के किराए के घर के दरवाज़े से घुसते हुए, हम सब के करुणानिधान पापा, हम सब के पढ़ने की तेज़ स्वरों में आती हुई आवाज़ से कितने प्रफुल्लित हो उठते थे।

होली क्रॉस कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ते हुए मेरे पापा मुझे ज़ोरदार भाषण देना सिखाते थे। वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में पक्ष और विपक्ष का तर्क ख़ूब लगन से ख़ुद अपने हाथों से लिखकर, पूरे जोशोखरोश के साथ बोलना सिखाते थे। आज भी याद है वो भाषण –

“क्या आग से आग को बुझाया जा सकता है? क्या कीचड़ से कीचड़ को हटाया जा सकता है? कभी नहीं। आग और कीचड़ को हटाने के लिए अहिंसा के शुद्ध एवं पवित्र जल की आवश्यकता होती है। दिलों के आग अहिंसा से ही पानी की तरह बुझाए जा सकते हैं।”

ऐसे ऐसे कई भाषणों का मेरे पापा मुझे घंटों अभ्यास कराते थे। दसवीं में हाई स्कूल द्वारा स्कूल कैप्टन चुने जाने के बाद कभी मेरा ‘वेल्कम स्पीच’ हो या ‘वोट ओफ़ थैंक्स’, मेरे पापा सब कुछ छोड़कर मेरे भाषण के वक़्त स्कूल की भीड़ का हिस्सा बनकर, मुझे सुनने आते थे और बिना बताए चले जाते थे।

मेरे ईमानदार पापा चाहे कुछ भी हो जाए, अपने बच्चों के लिए कभी किसी से पैरवी करने नहीं गए। मेरी माँ को आज तक मलाल है, फ़लाना बाबू को एक बार बस कह देते तो छः मार्क्स से उनका एमए एकनॉमिक्स में फ़र्स्ट डिविज़न ना छूटता।

कहते हैं सच्चाई और ईमानदारी के सिद्धांत को अपना लेने वालों के साथ जब भी कभी वक़्त चालाकी के पन्ने पलटता है, भगवान किसी न किसी रूप में मदद किया करते हैं। ताकि सच और ईमानदारी कभी शर्मसार न हो।

सालों किराए के चौधरी भवन के मकान में रहने वाले मेरे पापा से जब कोई पूछता था, अभी तक मकान क्यों नहीं बनाए? तो उनका जवाब होता था, मेरे बच्चे ही मेरे मकान हैं। और मेरे चार मकान तैयार हो रहे हैं।

मेरे माता-पिता ने हम बच्चों की पढ़ाई लिखाई में कोई कसर नहीं छोड़ा। सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते पर बेधड़क आगे बढ़ते जाना, बुराइयों के ख़िलाफ़ निडर और निर्भीक होकर अपना पक्ष रखना – मानो मुझे विरासत में मिले हैं। वहीं ईश्वर में अडिग आस्था रखने वाली मेरी माँ ने अपना विल पावर व किसी भी परिस्थिति में ‘हार नहीं मानूँगी’ सी जीवटता मुझे उपहार में दिया है। यूँ ही नहीं माता-पिता प्रथम गुरु कहे जाते हैं।

आज मेरे इस जनम की नीव रखने वाले, मेरे माता-पिता के गुणगान के लिए, मेरे पास सटीक शब्द नहीं। बस सोचकर मन प्रफुल्लित हो उठता है, ख़ुशकिस्मती सा महसूस होता है, कि वाह!! अपने इस जनम की यात्रा के लिए क्या ख़ूब माता-पिता चुना है। क्योंकि अपने माता-पिता का चुनाव हम इस पृथ्वी पर आने से पहले ख़ुद करते हैं, अपनी परिस्थितियाँ व वातावरण, जहाँ रहकर हमारा पूर्ण आध्यात्मिक विकास हो, ख़ुद चुनते हैं ताकि इसी जनम में हम जन्म लेने के उद्देश्य को प्राप्त कर सकें।