नन्हे कंधों पर भारी बोझ
March 12th, 2018 | Post by :- | 50 Views

नन्हे कंधों पर भारी बोझ

आधुनिक युग में भले ही हम प्रतिस्पर्धा करके पश्चिमी देशों की शिक्षा व्यवस्था से आगे निकलने का प्रयास क्यों न कर रहे हो लेकिन हमें वर्तमान पीढ़ी के मासूमों के बचपन के साथ खिलवाड़ नहीं करनी चाहिए । आज एक दो व तीन साल का बच्चा खिलौनों से खेलने के बजाय भारी भरकम बैग लेकर स्कूल में जाता है । उस बच्चे की दशा एक कच्ची मिट्टी के घड़े कैसे होती है जिसमें इतना वजन उठाने की ताकत भी नहीं होती, लेकिन इसके बावजूद भी वह माता-पिता के दबाव के चलते हल्के शरीर के पीछे दश किलो तक का वजन उठाने के लिए मजबूर है । दोष उस माता-पिता का नहीं है जिसने उसे यह बैग थमाया बल्कि उस प्रतिस्पर्धा के दौर का है जिसमें माता-पिता अपने बच्चे की शैक्षिक नींव को समय से पहले ही मजबूत करना चाहते हैं । वर्तमान दौर में अधिकतर माता-पिता नौकरी पेशे में इतने व्यस्त है कि वो धन कमाने की चाहत में परिवार के बाकी सदस्यों से बहुत दूर शहरों में जाकर बस गए हैं । बच्चे को परिवार के सदस्यों , दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन व अन्य लोगों के साथ खेलने और प्यार जताने का मौका ही नहीं मिल पाता । यह उस के सर्वांगीण विकास न होने का एक मुख्य कारण है । वह बच्चा अकेलेपन में या तो टैलिविजन कार्यक्रमों या फिर छोटे बच्चों के लिए बने विशेष स्कूलों में स्वयं को तन्हा महसूस करता है । आजकल गली- मोहल्लों खोले गए कई स्कूलों द्वारा अभिभावकों को यह ऑफर दिया जाता है कि वो उनके बच्चे को उस समय तक रखने के लिए तैयार है जिस समय तक माता-पिता नौकरी करके घर में लौट आएं । बच्चा अपना बचपन स्कूल के बाद घर की चारदीवारी में अकेले रहकर बिताता है। प्यार, दुलार, शरारत , जैसे वह बच्चा भूल ही गया है। शिक्षा के मायने उसे जल्दी प्रारंभ करने से नहीं है बल्कि उसे एक निश्चित समय में बच्चे की मानसिक परिपक्वता के आधार पर दिए जाने से हैं। आजकल ज्यादातर स्कूल शिक्षा के नाम पर 12 से 15 पुस्तकों की एक सूची माता-पिता को थमा देते हैं जिनकी कीमत ₹2000 से लेकर ₹4000 तक होती है । शिक्षा पहले भी गुणवत्ता पूर्वक थी और पहले भी इन सभी पुस्तकों का सार केवल उस छोटी सी किताब या कायदे में होता था जिसकी कीमत केवल 5 से 10 रुपये हुआ करती थी । जिस किताब के एक पेज पर गिनती, दूसरे पर वर्णमाला, तीसरे पेज पर अंग्रेजी के अल्फाबेट व छोटी-छोटी कहानियां होती थी । आज से लगभग बीस वर्ष पहले भी अध्यापक, कक्षा एक में ही वो सब ज्ञान दे देते थे जो आज प्ले स्कूल, प्री नर्सरी, नर्सरी ,व केजी जैसी 4 कक्षाओं में भारी फीस ले कर दिया जाता है । शिक्षा सही मायने में उस आयु में ही प्रारंभ होती है जब एक बच्चा दूसरों की बात को अच्छी तरह से समझ सके । जिस आयु में बच्चा अपनी भूख – प्यास व अन्य आवश्यकताओं को ही नहीं बता सकता भला वह स्कूल के द्वारा बनाए गए नियमों व पाठ्यक्रम को कैसे समझेगा । वर्तमान शिक्षा बच्चों से उनका बचपन छीन रही है । यह बच्चों की शिक्षा न होकर केवल उन से दूरी बनाने और संस्थानों द्वारा भारी-भरकम कीमत वसूल करने का एक माध्यम बन गई है । हमें अभिभावकों की जागरूकता के साथ- साथ उन सभी संस्थानों से भी अपील करनी चाहिए जो वर्तमान शिक्षा को बच्चों पर थोप रहे हैं । शिक्षा सरल एवं सुगम होनी चाहिए। शिक्षा बच्चों के कंधों व मन पर बढ़ रहे तनाव को कम करके उन्हें अपना बचपन खुशी पूर्वक बिताने देने वाली होनी चाहिए । सही समय पर दी गई शिक्षा से बच्चों का शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक विकास उन बच्चों की अपेक्षा अधिक होता है जो अपना बचपन पुस्तकों के वजन व माता- पिता के दबाव मे बंद चारदीवारों में बिताते हैं । स्वरचित लेख के माध्यम से मैं सभी प्रबुद्ध नागरिकों व अभिभावकों से निवेदन करता हूं कि वो छोटे बच्चों के कन्धों से इस बोझ को कम करें और उन्हें अपना बचपन खुशी पूर्वक बिताने में सहयोग देंवें।
युवा लेखक: अरविंद भारद्वाज LLB