युवाओं को भी मिले स्वामी विवेकानन्द के जैसे संस्कार तो विश्व गुरु बन सकता है भारत – गोकुल चन्द सैनी
January 12th, 2018 | Post by :- | 12 Views
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अलवर, लोकहित एक्सप्रेस, (विद्या सैनी) :-  स्वामी विवेकानन्द के 155 वीं जयन्ती पर अलवर में सैनी समाज संगोष्ठी का आयोजन किया जिसमे गोकुल चन्द सैनी ने स्वामी विवेकानन्द के जीवन में बचपन के संस्कार एवं जीवन यापन की कला को बताते हुए बताया कि स्वामी विवेकानन्द का जन्म १२ जनवरी  सन् १८६ (विद्वानों के अनुसार मकर संक्रान्ति संवत् १९२०)  कोकलकत्ता में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे दुर्गाचरण दत्ता, (नरेंद्र के दादा) संस्कृत और फारसी के विद्वान थे उन्होंने अपने परिवार को 25 की उम्र में छोड़ दिया और एक साधु बन गए। उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं। उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था। नरेंद्र के पिता और उनकी माँ के धार्मिक, प्रगतिशील व तर्कसंगत रवैया ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में मदद की। बचपन से ही नरेन्द्र अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के तो थे ही नटखट भी थे। अपने साथी बच्चों के साथ वे खूब शरारत करते और मौका मिलने पर अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत करने से नहीं चूकते थे। उनके घर में नियमपूर्वक रोज पूजा-पाठ होता था धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण माता भुवनेश्वरी देवी को पुराण, रामायण, महाभारत आदि की कथा सुनने का बहुत शौक था कथावाचक बराबर इनके घर आते रहते थे। नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था। परिवार के धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के प्रभाव से बालक नरेन्द्र के मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कार गहरे होते गये। माता-पिता के संस्कारों और धार्मिक वातावरण के कारण बालक के मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखायी देने लगी थी। ईश्वर के बारे में जानने की उत्सुकता में कभी-कभी वे ऐसे प्रश्न पूछ बैठते थे कि इनके माता-पिता और कथावाचक पण्डितजी तक चक्कर में पड़ जाते थे। गोकुल चन्द सैनी ने बताया कि ऐसे ही संस्कार अब युवा पीढ़ी को मिले एवं नई पीढ़ी भी ऐसे संस्कार ले तो देश पुनः विश्व गुरु बन सकता है।