पितृपक्ष: रूस, स्पेन और जर्मनी के लोग भी करने आ रहे हैं श्राद्ध

भारतीय मान्यताओं के रंग अब पूरी दुनिया पर छाने लगे हैं. इनपर न केवल यहां रहने वाले बल्कि अन्य देशों को लोग भी विश्वास करने लगे हैं. इन अद्भुत परंपराओं का आकर्षण कहिए कि सात समंदर पार के बाशिंदे भी खिंचे चले आते हैं. बिहार की विष्णु नगरी यानी गया में चल रहे पितृपक्ष मेले में ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं, जहां विदेशी भारतीय परंपराओं को अपना रहे हैं ।
पितृपक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष प्राप्ति के लिए पिंडदान और तर्पण के लिए रूस, स्पेन और जर्मनी से भी लोग यहां पहुंच रहे हैं. पितृपक्ष में पिंडदान के लिए प्रसिद्ध गया में इस बार 10 लाख श्रद्धालुओं  के आने की संभावना है. जिसमें से लगभग एक-तिहाई विदेशी होंगे ।

ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म कर पिंडदान और तर्पण करने से पूर्वजों की सोलह पीढ़ियों की आत्मा को शांति और मुक्ति मिल जाती है. इस मौके पर किया गया श्राद्ध पितृऋण से भी मुक्ति दिलाता है ।

18 विदेशियों की टीम को श्राद्ध कर्म के लिए लेकर आए टूरिस्ट गाइड लोकनाथ गौड़ बताते हैं “ये लोग भारतीय संस्कृति और परंपरा से काफी प्रभावित हैं. पितृपक्ष में अगले सप्ताह तक यहां रुक कर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके मोक्ष के लिए तर्पण एवं पिंडदान करेंगे.”
उन्होंने बताया कि वे शनिवार को पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और रविवार को अक्षयवट में कर्मकांड करेंगे. उसके बाद सभी सदस्य नई दिल्ली के लिए रवाना हो जाएंगे ।

पिंडदान करने आए विदेशियों का कहना कहा कि उन्होंने गया में पिंडदान के बारे में बहुत कुछ सुन रखा है और उससे प्रभावित होकर वे अपने पूर्वजों को सम्मान देने के लिए यहां आए हैं ।
रूस की क्रिकोव अनंतोलल्ला ने कहती हैं, “गया में पूर्वजों को लेकर होने वाले इस अनुष्ठान के बारे में मैंने सुन रखा था, जिससे यहां आने के लिए प्रेरित हुई.”

जर्मनी से आईं युगेनिया क्रेंच ने कहा कि उनके परिवार और घर में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है, इसलिए वह अपने इस दुर्भाग्य से छुटकारा पाने के लिए यहां आई हैं. उन्होंने कहा, ” इस परंपरा के विषय में मैंने काफी कुछ सुना है. इस कर्मकांड से न केवल पूर्वजों को मुक्ति मिलती है, बल्कि वर्तमान स्थिति में भी खुशहाली आती है.”

मंगलवार से प्रारंभ पितृपक्ष मेला 20 सितंबर तक चलेगा ।

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