मानव को उसके कर्तव्य का बोध करवाती है गीता : स्वामी ज्ञानानंद
August 23rd, 2021 | Post by :- | 197 Views

कुरुक्षेत्र, 23 अगस्त। जीओ गीता एवं श्री कृष्ण कृपा परिवार द्वारा गीता ज्ञान संस्थानम् में आयोजित दिव्य गीता सत्संग के अंतिम दिन व्यास पीठ से गीता ज्ञान की वर्षा करते हुए गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने कहा कि जहां कृष्ण है वहीं धर्म है और जहां धर्म है वहीं विजय होती है। उन्होने कहा कि अपने कर्तव्य की पालना करना ही गीता का सार है। इस अवसर पर नगर के प्रसिद्ध डा. अजय अग्रवाल, डा. प्रेरणा अग्रवाल ने मुख्यातिथि के रूप में तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव डा. संजीव शर्मा एवं कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सेवानिवृत्त सैशल जज डा. आरएन भारती ने दीप प्रज्जवलित किया, जबकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विभाग कार्यवाहक एवं कुवि डा. अंबेडकर अध्ययन केंद्र के सहायक निदेशक डा. प्रीतम, परीक्षा नियंत्रक डा. हुकम सिंह रंगा, प्रो. सीपी त्रिपाठी, श्री ब्राह्मण एवं तीर्थोद्धार सभा के मुख्य सलाहकार जयनारायण शर्मा, जजपा सेवादल के प्रदेशाध्यक्ष मायाराम चंद्रभानपुर, पूर्व कुलपति डा. राधेश्याम, पुलिस पीआरओ नरेश सागवाल, मातृभूमि सेवा मिशन के संचालक डा. श्रीप्रकाश मिश्रा, केडीबी सदस्य सौरभ चौधरी, जिला बार एसोसिएशन के प्रधान गुरतेज सिंह शेखों ने गीता पूजन किया और आरती में भाग लिया। संस्थान की ओर से कृष्ण कृपा समिति के प्रधान हंसराज सिंगला व केडीबी सदस्य महेंद्र सिंगला ने गणमान्य अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का मंच संचालन समिति के महासचिव एवं संक्रीर्तन प्रमुख सुनील वत्स ने किया।

स्वामी ज्ञानानंद ने कहा कि युद्ध की भूमि में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से गीता का उपदेश समस्त मानव कल्याण के लिए दिया। यह पहला ग्रंथ है जिसमें युद्ध की भूमि से शांति का संदेश दिया गया है। उन्होने कहा कि अर्जुन जैसा योद्धा जिसे कोई पराजित नही कर सका। जब वह महाभारत के युद्ध में मोहग्रस्त हो गया तो भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को उसका कर्तव्य याद करवाया। उन्होने कहा कि अपने कर्तव्य का पालन करना ही गीता का सार है। स्वामी जी ने कहा कि विपक्ष से आशीर्वाद लेने की परंपरा भी भारत की धरा पर ही देखी जा सकती है। अर्जुन ने युद्ध शुरु करने से पूर्व विपक्षी खेमे के अपने बुजुर्गों से आशीर्वाद लिया उस समय भीष्म पितामह ने अर्जुन को आशीर्वाद देते हुए कहा था कि जहां धर्म है वहां कृष्ण है और जहां कृष्ण है वहीं विजय है। स्वामी जी ने कहा कि महाभारत का युद्ध भगवान श्री कृष्ण की ही लीला थी। कुरुक्षेत्र की भूमि उस औलोकिक और अदभुत घटना की साक्षी है जहां युद्ध के मैदान से शांति का संदेश दिया गया। भगवान श्री कृष्ण ने जानबूझकर ऐसी लीला रखी ताकि विश्व को एक आलौकिक ज्ञान मिल सके। भगवान श्री कृष्ण की हर अदा और घटना एक लीला है और कृष्ण की हर लीला में गीता की प्रेरणा छुपी हुई है। कुरुक्षेत्र की भूमि में भगवान श्री कृष्ण ने वृंदावन की बांसुरी को शब्दों का भाव दिया। उन्होने कहा कि जिस प्रकार बांसुरी की ताल जीवन में मिठास भरती है इसी प्रकार गीता का अनुशरण करने से भी जीवन में मिठास आती है। इस भूमि पर बांसुरी की तान को शब्द मिले जोकि गीता ज्ञान के रूप में प्रचलित हुए।

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