गुरुकुल शिक्षा पद्धति जीवन निर्माण का आधार : आचार्य देवव्रत
August 22nd, 2021 | Post by :- | 63 Views
कुरुक्षेत्र 22 अगस्त :      गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि बच्चे किसी भी देश का भविष्य, उसकी धरोहर होती है और उनकी शिक्षा जिस परिवेश, जिस माहौल में होती है वह न केवल उन्हें अक्षरज्ञान दें बल्कि उनका सर्वांगीण विकास करें जिससे वे मानवता के कल्याण करने वाले बनें।
राज्यपाल आचार्य देवव्रत रविवार को गुरुकुल कुरुक्षेत्र में आयोजित उपनयन संस्कार और पर्यावरण एवं भू-सम्पदा संरक्षण संगोष्ठी को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने आधुनिक शिक्षा पद्धति और गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति के बीच अन्तर को स्पष्ट करते हुए कहा कि आधुनिक शिक्षा पद्धति जहां केवल मात्र नौकरी, आजीविका का साधन बनकर रह गई है, वहीं गुरुकुल शिक्षा पद्धति जीवन निर्माण का आधार है। गुरुकुल शिक्षा पद्धति हमें आपसी प्यार, भाईचारा, एकता, सहिष्णुता और अपने कत्र्तव्य व जिम्मेदारी का बोध कराती है। समाज को नई दिशा देने के लिए हमें प्रेरित करती है, देश के लिए कुछ करने के लिए हमारे अन्दर जज्बा पैदा करती है। गुरुकुल शब्द का अर्थ है- गुरु का कुल अर्थात् विशाल परिवार। वहीं ब्रह्मचारी को महानता में विचरण करने, मन को नियंत्रित और एकाग्रचित्त होकर विद्या ग्रहण करने वाला बताया। इस अवसर पर गुरुकुल के प्रधान कुलवन्त सिंह सैनी, निदेशक व प्राचार्य कर्नल अरुण दत्ता, वैदिक विद्वान डॉ. राजेन्द्र विद्यालंकार, सह प्राचार्य शमशेर सिंह, कर्नल बीजी रॉय सहित अध्यापकगण व संरक्षकगण मौजूद रहे। मंच संचालन मुख्य संरक्षक संजीव आर्य द्वारा किया गया।
उपनयन संस्कार पर बोलते हुए आचार्य देवव्रत ने कहा कि प्राचीनकाल से ही भारतीय समाज में संस्कारों का विशेष महत्व है। जन्म से मृत्युपर्यन्त तक मनुष्य के 16 संस्कार है, जिनमें उपनयन संस्कार की अलग ही उपयोगिता है। यह संस्कार ब्रह्मचारी को जिम्मेदारियों का पालन करने, ईश्वर की प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है। उपनयन का अर्थ है-गुरु शिष्य का परस्पर नजदीक आना। अर्थात् उपनयन संस्कार के उपरान्त गुरु ब्रह्मचारी का धर्म का पिता और ब्रह्मचारी गुरु का धर्म का पुत्र बन जाता है। गुरु अपने शिष्य को संस्कार और अक्षर का ज्ञान देता है जो मानवता के कल्याण का आधार बनता है, यह हमारी संस्कृति का व्यापक चिंतन के रूप में अनूठा मूल्य है। उपनयन संस्कार में ब्रह्मचारी यजोपवीत धारण करता है, इसके तीन धागे हमें तीन कत्र्तव्यों या तीन ऋण का बोध कराते हैं। पहला कत्र्तव्य है आलस्य को त्याग कर विद्या अध्ययन करके शिक्षा के क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित करना। इसके साथ दूसरा कत्र्तव्य अपने माता-पिता के ऋण से उऋण होना अर्थात् अपने माता-पिता की सेवा करना और उनके मान-सम्मान को अपने व्यवहार एवं आचरण से बढ़ाना। तीसरे धागे से हमें देव ऋण से उऋण होने का बोध होता है। देव का अर्थ है देने वाला, गुरुकुलीय परम्परा मनुष्य को उदारवादी बनाती है।
राज्यपाल ने पर्यावरण एवं भू-सम्पदा संरक्षण पर बोलते सभी ब्रह्मचारियों को प्रकृति की रक्षा करने का संकल्प दिलाया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए हमें ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाने चाहिए, स्वच्छता अभियान चलाना चाहिए, प्राकृतिक सम्पदा का संरक्षण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम सभी को अपने-अपने जन्मदिवस, विवाह की वर्षगांठ व अन्य शुभ अवसरों पर एक पौधा अवश्य लगाना चाहिए। केवल मात्र पौधा लगाने तक ही सीमित नहीं रहना बल्कि उनकी देखभाल भी करनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को हम एक साफ-सुधरा वातावरण दे सकें। अन्त में उन्होंने सभी ब्रह्मचारियों को रक्षाबंधन एवं श्रावणी उपाकर्म पर्व की बधाई दी। कार्यक्रम में मुख्य संरक्षक संजीव आर्य ने गुरुकुल कुरुक्षेत्र को जर्जर गुरुकुल से हरियाणा का नंबर वन शिक्षण संस्थान बनाने के आचार्य देवव्रत के सार्थक प्रयास को एक गीत के माध्यम से प्रस्तुत किया जिससे पूरा सभागार तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज उठा।
निदेशक व प्राचार्य कर्नल अरुण दत्ता ने कहा कि आचार्य देवव्रत जी की कड़ी मेहनत और तपस्या से गुरुकुल को नवस्वरूप प्रदान किया है। जर्जर हालत में मात्र 21 वर्ष की आयु में गुरुकुल की कमान संभालने वाले आचार्य देवव्रत ने एक सकारात्मक सोच के साथ न केवल गुरुकुल में आधुनिक भवनों का निर्माण कराया बल्कि यहां छात्रों के लिए अत्याधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध करवाई है, जिनके दम पर आज गुरुकुल कुरुक्षेत्र पिछले चार वर्षों से हरियाणा का नंबर वन आवासीय विद्यालय है। उन्होंने कहा कि आचार्य देवव्रत जी ने गुरुकुल से सेना में बड़े अधिकारी बनाने का जो सपना देखा, आज वह साकार हो रहा है और प्रतिवर्ष गुरुकुल से कई ब्रह्मचारी एनडीए सहित आईआईटी, पीआईएमटी में जा रहे है। गुरुकुल के प्रधान कुलवन्त सिंह सैनी ने कार्यक्रम में पधारने पर राज्यपाल आचार्य देवव्रत सहित सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया और सभी छात्रों को रक्षाबंधन की बधाई दीं। रक्षाबंधन पर्व को लेकर गुरुकुल में ब्रह्मचारियों हेतु राखी की भी व्यवस्था की गई और जिन बच्चों के घर से राखी नहीं आ पाईं उन्हें गुरुजनों ने राखी बांधकर रक्षाबंधन का पर्व मनाया।

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