प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता मॉ-बेटे जैसा है, इसलिए जितनी जरूरत है प्रकृति से उतना ही लें
September 22nd, 2019 | Post by :- | 156 Views

चंडीगढ़ (मनोज शर्मा) पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डा. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि प्रकृति को दोहन करें, लेकिन शोषण मत करें। प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता मॉ-बेटे जैसा है, इसलिए जितनी जरूरत है प्रकृति से उतना ही लें, संतुलित व्यवहार रखना चाहिए।

डा. मुरली मनोहर जोशी रविवार को पंचनद शोध संस्थान व  पंजाब यूनिवर्सिटी के पर्यावरण विभाग तथा चंडीगढ़ प्रशासन के पर्यावरण विभाग  द्वारा पर्यावरण एवं जल की वैश्विक समस्या व समाधान विषय पर आयोजित व्याख्यान माला के दूसरे दिन जिज्ञासा समाधान सत्र में प्रतिभागियों के प्रश्रों के उत्तर दे रहे थे। इस मौके पर कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व लोकायुक्त जस्टिस प्रितमपाल सिंह ने की, विशिष्ट अतिथि के तौर पर पंजाब यूनिवर्सिटी के वीसी डा. राजकुमार, डा. के.एस.आर्य, पंचनद शोध संस्थान के निदेशक प्रो. बी.के. कुठियाला, पीयू के पर्यावरण विभाग की अध्यक्ष डा. सुमन मोर विशेष तौर पर मौजूद थे। जिज्ञासा समाधान सत्र में कई ऐसे प्रश्र आए जिनका उत्तर  उन्होंने हाजिर जवाबी के साथ  दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जाति को प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाकर ही आगे बढऩा चाहिए। उन्होंने कहा कि घरों के भी ऐसे मॉडल बनाने की जरूरत है जिससे की ऊर्जा की खपत कम से कम हो जिससे की प्राकृतिक संसाधनों का शोषण कम किया जा सके। एक सवाल के जवाब में उन्होंने मिट्टी के वर्तनों में पानी रखने की सलाह दी, लेकिन ऐसा किया जाने पर आपको बैकवर्ड की संज्ञा दे दी जाएगी, जो कि एक गलत धारणा है। प्लास्टिक के प्रयोग को कम किया जाए। स्मार्ट सिटी पर उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि मुझे दुनिया में बता दिजिए जो एक स्मार्ट सिटी हो, यह एक छलावा है। उन्होंने जल सरंक्षण पर विशेष जोर दिया। हर व्यक्ति को अपनी आवश्यकताएं सीमित करनी होंगी, पानी की जितनी जरूरत है, उतना ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। शनिवार को भी डा. जोशी ने कहा कि वह जब बनारस के सांसद थे तो उस समय वहां 2 डार्क जोन होते थे, लेकिन अब तो देश में 700-800 हो गए हैं। भूजल में आर्सेनिक की मात्रा अधिक होने से कैंसर की समस्या उत्पन्न हो गई है, पंजाब में तो एक ट्रेन को ही कैंसर एक्सप्रेस कहा जाता है। इसलिए उन्होंने रविवार को भी पानी के भण्डारण पर जोर दिया, उन्होंने बिजली के विषय पर भी कहा कि इसका इस्तेमाल भी कम से कम किया जाए, ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा की पैदावार है।
डा. जोशी ने रविवार को भी सेमीनार में एक उद्बोधन दिया, उन्होंने कहा कि पश्चिमी सभ्यता और भारतीय सभ्यता की बुनियादी सोच में एक बहुत बड़ा फर्क है। उनका मॉडल प्रकृति के शोषण पर आधारित है जबकि हमारे यहां तो आदिकाल से ही सर्वजन हिताय: सर्वजन सुखाय: का पाठ पढ़ाया जाता है। आज की दुनिया की बहुत सी मुसीबतों की जड़ उन्होंने मार्केट इकॉनमी पर आधारित व्यवस्थाओं को बताया। ट्रंप और चाइना का झगड़ा भी मार्केट शेयर को लेकर ही है।
डा. मुरली मनोहर जोशी ने जीडीपी के बारे में कहा कि किसी देश के विकास को मापने का यह पैमाना ही गलत साबित हो रहा है, क्योंकि बढ़ी हुई जीडीपी का मतलब समुचित विकास नहीं, बल्कि जिन देशों की जीडीपी ज्यादा है, वहां अपराध, ड्रग्स, डिप्रेशन अधिक है। भले ही भूटान छोटा देश है, लेकिन उसने जीडीपी के पैमाने को नकार दिया उसने ग्रॉस हैप्पिनस इंडक्स को माना है। जीडीपी की बढ़ोतरी से प्रकृति का शोषण भी बढ़़ेगा। एक बहुत बड़े अर्थशास्त्री ने 2017 में कहा था कि अंधाधुंध विकास की दौड़ एक पागलपन है। उन्होंने भौतिकी से इस विषय को जोड़ते हुए बताया कि लगभग 40 साल के अध्ययन के बाद अब पश्चिमी वैज्ञानिक भी यह मानने लग गए हैं कि हर चीज का समाधान मनुष्य के अंदर ही छिपा है।
डा. जोशी ने कुछ आध्यात्मिक बात भी बताई कि अब तो यूएनओ की मीटिंग में भी मानसिक शांति के लिए प्राणायाम कराया जाता है, भारत को नकल नहीं करनी बल्कि मौलिक होना है तभी यह विश्वगुरू बनेगा। इसी भारतीय चिंतन के आधार पर भारत विश्वगुरू बनेगा। उन्होंने एक उदाहरण देकर समझाया कि भूख लगना प्रकृति है, भूख लगने पर किसी का निवाला छिन लेना विकृति है और बांटकर खाना संस्कृति है। इन सांस्कृतिक जीवन मूल्यों का निर्वहन करते हुए ही आगे बढऩा है। उन्होंने फिर जोर देकर कहा कि सस्टेनबल कंजंपसन होनी चाहिए न की सस्टेनबल डेवलपमेंट।
उधर, पूर्व लोकायुक्त एवं नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की एक कमेटी के चेयरमैन जस्टिस प्रीतमपाल सिंह ने कुछ ऐसे उदाहरण देकर समझाया कि किस तरह से जल प्रदूषण हो रहा है, ब्यास के पास एक सुगर मिल के प्लांट के सीरे ने डेढ़ लाख से 2 लाख मछलियां मार दी, लुधियाना के बूढानाला का पानी सतलुज में जाता है, जिससे आगे जहां पर यह पानी जाता है उस एरिया में कैंसर जैसी बीमारी हो रही है। जस्टिस प्रीतमपाल ने बलबीर सिंह सींचेवाला का उदाहरण देकर कहा कि उन्होंने जल प्रदूषण को रोकने के लिए प्ररेणादायक कार्य किए हैं। इसी तरह उन्होंने एक परवाणु के व्यक्ति का जिक्र किया। वहीं, पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अधिकारियों पर काम ठीक से नहीं करने की बात भी उन्होंने कही। हरियाणा में सरस्वती नदी में पांच फैक्ट्रियों का दुषित पानी अंडरग्राउंड पाइप के जरिए पहुंचाने की बात भी उन्होंने कही। जस्टिस प्रीतमपाल सिंह ने कहा कि पर्यावरण को बचाने के लिए जुनुनी तरीके से काम करने की जरूरत है।

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