हिंदी के विकास में समाचार पत्र व पत्रिकाएं निभा रहीे है महत्वपूर्ण भूमिका।
September 16th, 2020 | Post by :- | 124 Views

पंचकूला।(मनीषा)  अंग्रेजी के प्रभाव से रिश्तों की आत्मीयता भी सिमट रही है। समाज में ताऊ, चाचा, मामा, फूफा के लिए अंकल तो ताई, चाची, मामी, बुआ के लिए आंटी शब्द का प्रयोग होने लगा है। इसी तरह दादा-नाना के लिए ग्रांड फादर और दादी-नानी के लिए ग्रांड मदर का इस्तेमाल कर लोग अंग्रेजियत की दौड़ में हिंदी के साथ संबंधों में मधुरता के रस को भी नीरस कर रहे हैं। हालांकि कुछ युवा आज भी इस अंधी दौड़ से अलग हैं। 14 सितंबर प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) में हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा प्राप्त है, लेकिन आज राष्ट्र भाषा अपने अस्तित्व पर आंसू बहा रही है।
यह अपने ही राष्ट्र में अजनबी सी लगती है। जिस राष्ट्र की अपनी भाषा नहीं, अपनी संस्कृति-सभ्यता नहीं, वह राष्ट्र अधिक देर तक जीवित नहीं रह पाता। स्वतंत्रता पूर्व भारतवर्ष में क्रमश: उर्दू व अंग्रेजी भाषाओं का प्रचलन अधिक रहा है। भाषा नागरिक के चिंतन तथा अभिव्यक्ति को प्रभावित करती है। राष्ट्र भाषा देश के कोने-कोने में बसे लोगों के भावों को व्यक्त करती है। राष्ट्र भाषा हिंदी की घोर उपेक्षा विषय पर लोकहित एक्सप्रेस द्वारा कॉलेज छात्राओं से बातचीत की गई। प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंश:-
-कालेज स्टूडेंट पलक सिंगला का कहना है कि हिंदी विरोधियों का मत है कि हिंदी के प्रचार से क्षेत्रीय अथवा प्रांतीय भाषाएं पनप नहीं पाएंगी, परंतु इस दिशा में उन्हें यह स्मरण रखना होगा कि प्रांतीय भाषाएं हिंदी की महोदर हैं। हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है, लेकिन आज भी हम हिंदी को वह सम्मान नहीं दिला पाए हैं,जो मिलना चाहिए था। 14 सितंबर को साल में एक बार ही हिंदी की याद आती है।
-स्टूडेंट पलक सिंगला
-रायपुररानी की सोनाली ने कहा कि जिस तरह से आज की पीढ़ी हिंदी से दूर जा रही है, वह निंदनीय है। अंग्रेजी भाषा सीखना बुरा नहीं है, परंतु अपनी राष्ट्रीय भाषा की अनदेखी करना भी सही नहीं। उन्होंने कहा कि आज हमारी मातृभाषा अपनी ही संतान की ओर मुंह ताक देख रही है कि उसे उसका अधिकार कौन दिलाएगा।
-सोनाली
-मेडिकल स्टूडेंट पलक सिंघल ने कहा कि हिंदी दिवस को लेकर हर कोई बढ़-चढक़र दावे करता है, लेकिन उसके पश्चात हिंदी अगले साल ही याद आएगी। हिंदी हमारी भावानात्मक एकता की प्रतीक है। जब हमारा संविधान बना था तो उस समय यह घोषणा की गई थी कि अगले 15 सालों तक हिंदी अनिवार्य कर दी जाएगी। लेकिन अब वह सम्मान राष्ट्र भाषा को नहीं मिल पाया।
-पलक सिंघल
-सेवा भारती हरियाणा की सदस्य आस्था गर्ग के अनुसार आज प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों को अंग्रेजी भाषी विद्यालयों में प्रवेश दिलाते हैं। अगर बच्चे से ए . बी.सी. सुनाने को कहा जाए तो वह पूरे 26 अक्षर सुना देगा और अगर क,ख,ग सुनाने को कहा जाए तो टांय-टांय फिस्स। कहने का तात्पर्य है कि स्वयं भारतवासी ही हिंदी का गला घोट रहे हैं और विदेशी भाषा को गले लगा रहे हैं।
-आस्था गर्ग
छात्रा शगुन का कहना है कि सरकारी व अद्र्धसरकारी कार्यालयों व मंत्रालयों में पत्र व्यवहार भी अंग्रेजी में होने लगा है। शिक्षा तथा व्यावहारिक कार्यों में अंग्रेजी ने अपना एकाधिकार जमा लिया है। ऐसे में बेचारी हिंदी का क्या हाल होगा, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
-शगुन
हिंदी के विकास में समाचार पत्र पत्रिकाएं बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। राष्ट्रभाषा सिर्फ हिंदी दिवस तक ही सिमट कर रह गई है। इसको लेकर अभियान जरुर चलते हैं, लेकिन उनमें भी कार्य अंग्रेजी में ही होता है। हिंदी की घोर उपेक्षा के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। यदि हिंदी के अस्तित्व को जिंदा रखना है, तो इसके लिए सार्थक प्रयास करने होंगे।

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