बहादुरगढ़ लोकहित एक्सप्रेस ब्यूरो चीफ (गौरव शर्मा)
कांग्रेस के नेता विक्रम कादयान ने केंद्रीय सरकार के बजट पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह बजट आम नागरिक की उम्मीदों पर खरा उतरने में पूरी तरह विफल रहा है। यह बजट गरीब और मध्यम वर्ग की जेब पर बोझ डालने वाला है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल और रोजगार जैसे बुनियादी क्षेत्रों को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय बजट में शिक्षा के क्षेत्र को सबसे अधिक उपेक्षा का शिकार बनाया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करने का लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन केंद्रीय बजट में शिक्षा के लिए वास्तविक प्रावधान अब भी लगभग 3 प्रतिशत के आसपास सिमटे हुए हैं। महँगाई को ध्यान में रखा जाए तो शिक्षा बजट में वास्तविक वृद्धि नहीं, बल्कि कटौती जैसी स्थिति बन गई है।
विक्रम कादयान ने कहा कि
• केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी, एनआईटी और राज्य विश्वविद्यालयों को मिलने वाले केंद्रीय अनुदानों में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं की गई, जिससे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी।
• यूजीसी, शोध अनुदान परिषदों और नवाचार कार्यक्रमों के बजट में ठोस वृद्धि न होने से पीएचडी, पोस्ट-डॉक्टरल रिसर्च और स्टार्ट-अप आधारित शोध को झटका लगेगा।
• छात्रवृत्ति योजनाओं में न तो दायरा बढ़ाया गया और न ही राशि में प्रभावी वृद्धि की गई, जिससे गरीब, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के छात्रों की उच्च शिक्षा तक पहुँच और कठिन होगी।
• डिजिटल शिक्षा की घोषणाएँ तो हैं, लेकिन ग्रामीण भारत में इंटरनेट, शिक्षक संसाधन और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कोई स्पष्ट केंद्रीय रोडमैप नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि शिक्षा को निवेश मानने के बजाय उसे खर्च की तरह देखा गया है, जबकि शिक्षा ही देश की मानव पूंजी, रोजगार सृजन और सामाजिक न्याय की रीढ़ है। कादयान ने कहा कि केंद्रीय बजट में खेल क्षेत्र के लिए भी कोई दूरदर्शी सोच नहीं दिखाई देती। जमीनी स्तर के खेल ढांचे, खेल विश्वविद्यालयों और खिलाड़ियों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के लिए ठोस केंद्रीय प्रावधानों का अभाव है, जबकि भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेहतर प्रदर्शन का दावा करता है। उन्होंने कहा कि रेलवे, स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा जैसे राष्ट्रीय महत्व के क्षेत्रों में भी बजट अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता। विक्रम कादयान ने आरोप लगाया कि यह केंद्रीय बजट क्षेत्रीय संतुलन और सामाजिक न्याय की भावना से रहित है। बेरोजगारी, महँगाई और आय असमानता जैसे गंभीर मुद्दों से निपटने के लिए इसमें कोई ठोस नीति या प्रभावी रोडमैप नहीं है। लोकलुभावन घोषणाओं के माध्यम से आम जनता के हाथों में केवल झुनझुना थमाया गया है। अंत में उन्होंने कहा कि यह केंद्रीय बजट न तो समावेशी विकास का दस्तावेज है और न ही विकसित भारत की ठोस नींव रखता है। यह बजट आम जनता की आकांक्षाओं से कटा हुआ और जमीनी हकीकत से दूर एक निराशाजनक दस्तावेज है।





