श्राद्ध हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का एक सनातन वैदिक संस्कार हैं : आचार्य विशाल
September 12th, 2019 | Post by :- | 180 Views

चंडीगढ़ (मनोज शर्मा) आगामी 14 सितम्बर से 28 सितम्बर तक श्राद्ध पक्ष है। उक्त जानकारी देते हुए सुखमय सेवा एवं चैरिटेबल समिति के स्थानीय अध्यक्ष पं. आचार्य विशाल ने से. 47 में आयोजित एक कार्यक्रम मे श्रद्धालुगणों को सम्बोधित करते हुए बताया कि सबके लिये आवश्यक हैं। कि हिन्दूधर्म के अनुसार, प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता, पूर्वजों को नमस्कार प्रणाम करना हमारा कर्तव्य है। हमारे पूर्वजों की वंश परम्परा के कारण ही हम आज यह जीवन देख रहे हैं व इस जीवन का आनंद प्राप्त कर रहे हैं। श्राद्ध हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का एक सनातन वैदिक संस्कार हैं। जिन पूर्वजों के कारण हम आज अस्तित्व में हैं,जिनसे गुण व कौशल आदि हमें विरासत में मिलें हैं । उनका हम पर न चुकाये जा सकने वाला ऋण हैं। उन्होंने हमारे लिए हमारे जन्म के पूर्व ही व्यवस्था कर दी थी। वे हमारे पूर्वज पूजनीय हैं, उन्हें हम इस श्राद्ध पक्ष में स्मरण कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। वास्तव में, वे प्रतिदिन स्मरणीय हैं। श्राद्ध पक्ष विशेषतः उनके स्मरण हेतु निर्धारित किया गया हैं। इस धर्म मॆं, ऋषियों ने वर्ष में एक पक्ष को पितृपक्ष का नाम दिया, जिस पक्ष में हम अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध, तर्पण, मुक्ति हेतु विशेष क्रिया संपन्न कर उन्हें अर्ध्य समर्पित करते हैं।

उन्होंने श्राद्ध करने की विधि का वर्णन करते हुए बताया कि श्राद्ध तिथि के दिन प्रात:काल उठकर किसी पवित्र नदी अथवा घर में ही स्नान करके पितरों के नाम से तिल, चावल (अक्षत) और कुशा घास हाथ में लेकर पितरों को जलांजलि अर्पित करें। इसके उपरांत मध्याह्न काल में श्राद्ध कर्म करें और ब्राह्मणों को भोजन करवाकर स्वयं भोजन करें। शास्त्रानुसार जिस स्त्री के कोई पुत्र न हों, वह स्वयं अपने पति का श्राद्ध कर सकती है। इस दिन गया तीर्थ में पितरों के निमित्त श्राद्ध करने के विशेष माहात्म्य माना जाता है। प्राय: परिवार का मुखिया या सबसे बड़ा पुरुष ही श्राद्ध कार्य करता है। उपरोक्त विधि से जिस परिवार में श्राद्ध किया जाता है, वहां यशस्वी लोग उत्पन्न होते हैं। इसके अलावा श्राद्ध में गाय, कुत्ते और कौवे के लिये भोजन अवश्य निकलना चाहिए तथा गाय को तिलक भोजन कराकर उसके उपर वस्त्र जरुर दें।
उन्होंने कहा कि ऐसा विश्वास है कि श्राद्ध से प्रसन्न होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को आयु, धन, विद्या, सुख-संपत्ति आदि प्रदान करते हैं। पितरों के पूजन से मनुष्य को आयु, पुत्र, यश-कीर्ति, लक्ष्मी आदि की प्राप्ति सहज ही हो जाती है।
आचार्य विशाल ने श्राद्ध के भोजन के बारे में बताया कि ज़्य़ादातर पकवान पितरों की पसंद के होने चाहिए। खीर पूरी अनिवार्य है जबकि जौ, मटर और सरसों का उपयोग श्रेष्ठ है। गंगाजल, दूध, शहद, कुश के साथ-साथ तिल सबसे ज्यादा ज़रूरी है क्योंकि तिल ज़्यादा होने से उसका फल अक्षय होता है व तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं।
इसके अलावा उन्होंने श्राद्ध के भोजन में वर्जित खाद्य पदार्थों के बारे में बताया कि चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, प्याज और लहसन, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, खराब अन्न, फल और मेवे का प्रयोग व सेवन नहीं करना चाहिए।
अंत में उन्होंने बताया कि ब्राह्मणों को रेशमी, ऊनी, लकड़ी, कुश जैसे आसन पर बैठाएं परन्तु लोहे के आसन पर ब्राह्मणों को कभी न बैठाएं।

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