सरकार की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल पूनम चौधरी
August 26th, 2020 | Post by :- | 145 Views

नांगल चौधरी( वीरेंद्र सिंह जाजम),प्रमुख समाजसेविका पूनम चौधरी ने कहा कि राजनीति में नेता जब किसी पद से हटता है तो उसको पेंशन दी जाती है। अगर कोई नेता विधायक और सांसद दोनों सीटों पर चुनाव लड़ चुका है, तो उसे पूरी जिंदगी दोनों जगह से पेंशन मिलती है। जितनी बार भी वह विधायक या सांसद बनता है। उतनी बार ही उसकी पेंशन उसमे ADD होती चली जाती हैं। सरकार के पास इस चीज की कोई जवाबदेही नहीं है, कि कब पेंशन बढ़ानी है और कब नहीं। सारी शक्तियां इन्हीं राजनीतिक दलों के पास होने के कारण इसका फायदा ये बखूबी उठाते हैं।
भले ही देश में किसी भी प्रकार का संकट हो ये लोग कभी भी अपनी पेंशन में कटौती नहीं करते। इन विषयों पर सभी राजनीतिक दल एकमत हो जाते हैं। बल्कि दूसरों से आग्रह करते हैं कि वह भी अपना योगदान दें। उदाहरण के तौर पर लॉकडाउन के अंतराल पर किसानों को अनाज दान करने के लिए कहा गया था। और इसके अतिरिक्त जो हमारे सरकारी अधिकारी व कर्मचारी हैं। वो अपना काम बेखूबी से करते हैं। भले ही देश व प्रदेश में कोई संकट की घड़ी आई हो, इनको अलग से भी जिम्मेदारियां दी जाती है। इसके बावजूद 2004 के बाद से सरकारी कर्मचारियों के लिए पेंशन की सुविधा समाप्त कर दी गई है। ऐसा क्यों ?

जब ये लोग 55 या 58 वर्ष तक अपनी सेवाएं देते हैं। इसके बावजूद भी इन लोगों के पास (Provident fund) के अलावा कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। कितनी बार सरकारी कर्मचारियों की भर्ती में घोटाला होने की वजह से इन कर्मचारियों को बीच में ही हटा दिया जाता है। हाल ही में जो पीटीआई (PTI) कर्मचारी उनके पद से हटाए गए हैं। इनको लगाने की प्रक्रिया में जो गड़बड़ी हुई थी। वह सरकार की गलती थी, लेकिन 10 साल नौकरी करने के बाद भुगतान इन कर्मचारियों को करना पड़ रहा है। इस आघात के कारण एक अध्यापक की ब्रेन हेमरेज के कारण मृत्यु भी हो गई। अब जिन लोगों ने अपनी नौकरी के बलबूते पर बच्चो की शिक्षा, घर का खर्च,कार लोन, होम लोन इत्यादि ले रखा था। वह क्या करें ?

अब इन सब की जवाबदेही किसकी है। इनसे भी बुरी स्थिति में है हमारा किसान वर्ग, लॉकडाउन की वजह से श्रमिकों को पहले पैसे देकर बुलाया जा रहा है, फिर धान की फसल लगाई जा रही है। इस प्रक्रिया से जो लागत मूल्य है। वह इतना बढ़ चुका है कि अगर हम इसको MSP से तुलना करें कि उनको MSP कितना मिलेगा। उस पर कोई चर्चा ही नहीं हो रही है। हाल ही की स्थितियों को देखते हुए किसानों की जो लागत मूल्य है। वह इतनी बढ़ चुकी है कि जो उसकी आय होती है वह बचती ही नहीं, और जो थोड़ी बहुत बचती है वह लोन देने में चली जाती है। सरकारों ने इतनी बड़ी आपदा आने के बाद भी किसानों की सहायता करने के बजाय उन्हें और अधिक कर्ज कर देने की व्यवस्था कर दी है। सरकार का बार-बार किसानों को लोन देना, उन को सशक्त करने के प्रयास को विफल कर रहा है। पूनम चौधरी कहा कि ऐसे तो हम कृषि का व्यवसायिक ढाचा कभी तैयार ही नहीं कर पाएंगे। अब इन सबको हम जोड़कर देखें तो जिस उद्देश्य के लिए हम राजनेताओं को चुनते हैं। उनकी जवाबदेही तो खत्म ही हो गई है, क्योंकि वो सिर्फ चुनाव से 6 महीने पहले और 6 महीने बाद ही दिखते हैं बीच के 4 साल तो कहीं गायब ही हो जाते हैं। और इन सभी नेताओं के द्वारा चुनाव के समय झूठे वादे करके भोली-भाली जनता को बेवकूफ बनाया जाता है। 1947 के बाद जो हमारे लोकतंत्र के मूल सिद्धांत निकल कर सामने आए थे। यानी गरीब और अविकसित वर्ग के कल्याण के लिए जो समानता लाने का काम था। वह अब पूरी तरह से विफल हो चुका है।

राजनेताओं के पास तो अपनी पेंशन को लेकर बहुत अधिक सुविधाएं हैं। परंतु हमारे किसान वर्ग और सरकारी कर्मचारियों की जो सामाजिक सुरक्षा हैं। उनको अधिक से अधिक तरीकों से छीन लिया गया है। तो जिस तरह से यह तंत्र बना दिया गया है। इन राजनेताओं ने अपनी पेंशन में तो कभी कटौती की ही नहीं है। जब अपने पैसों की कटौती करने का समय आता है तो ये सभी पार्टियां एकमत हो जाती है। ये एक ऐसा तंत्र बना दिया गया है कि अगर आप उस तंत्र का हिस्सा है। तो आपको कोई परेशानी नहीं होगी। ऐसे तंत्र से समाज में असमानता होनी तय है। और हम इसको कम करने का प्रयास ही नहीं कर रहे हैं। हमारे राजनेता ऐसे हो गए हैं कि जिनकी कोई जवाबदेही ही नहीं रही है। तो इन सबको ऐसे नियंत्रित तरीके से चलाया जा रहा है। अगर सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की पेंशन बन्द की जा सकती हैं तो विधायको और सांसदो की पेंशन बन्द की जानी चाहिए।

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