उत्तम आकिंचन धर्म के जयकारें हुआ स्वर्ण कलशों से श्रीजी का कलशाभिषेक
September 11th, 2019 | Post by :- | 110 Views

जयपुर,(सुरेन्द्र कुमार सोनी) । मानसरोवर स्थित वरुण पथ दिगम्बर जैन मंदिर में चल रहे चातुर्मास के दोरान मुनि विश्वास सागर एवं मुनि विभंजन सागर महाराज ससंघ सानिध्य में दशलक्षण महापर्व के नवें दिन “उत्तम आकिंचन धर्म” का जयकरों के साथ गुणगान किया गया। इस अवसर पर प्रात: 6 बजे से मूलनायक महावीर स्वामी के स्वर्ण कलशों से अभिषेक किये गए एवं रजत कलश से शांतिधारा कर मुनि विश्वास सागर के मुखारविंद जगत के कल्याण और सुख–सम्रद्धि की कामना करते हुए शांतिधारा अर्घ चढाया गया। जिसके उपरांत आचार्य विद्या सागर सभागार में पन्डूक्षिला पर श्रीजी को विरजमान कर कलशाभिषेक एवं शांतिधारा कर कर्म निर्जरा विधान पूजन के साथ उत्तम आकिंचन धर्म का पूजन किया गया। पूजन प्रारम्भ करने से पूर्व समाजसेवी नन्दलाल राजकुमार काला परिवार को सोधर्म इंद्र बन्ने का सोभाग्य प्राप्त किया और मंडल जी पर कलश स्थापित कर विधान पूजन प्रारम्भ किया। इस दोरान काला परिवार ने दीप प्रव्ज्ज्लन कर युगल मुनिराज को शास्त्र भेंट कर पाद प्रक्षालन करने का भी सोभाग्य प्राप्त किया।
बुधवार को प्रातः 8.30 बजे मुनि विभंजन सागर महाराज ने “उत्तम आकिंचन धर्म” पर अपने उपदेश में कहा की मैं आकिंचन हुं। कुछ भी मेरा नहीं है परन्तु मोह के वश से यह मेरा हैं मै इसका हूँ। इस प्रकार की जो मूर्छा है उसको दुष्ट ग्रह की तरह मेरा कुछ नहीं है इस आकिंचन रूपी प्रसिद्ध मंत्र के सतत अभ्यास से जो नष्ट करते हैं वे विश्व के स्वामी सज्जनो के आश्चर्य कारी चारित्र का निरन्तर आचरण करते हैं। कुछ लोग काला सर्प के समान विषैले होते हैं,सर्प कॉचली तो छोडता है किन्तु विष नही छोडता। उसी प्रकार कोई दुर्वुद्धि बाला वस्त्र आदि का त्याग करता है किन्तु परिग्रह नहीं छोडते है। जैसे मगध सम्राट विम्बसार राजा श्रेणिक के जीवन का प्रसंग है। एक लंगोट का परिग्रह भी ऐलक जी को सोलहवे स्वर्ग के ऊपर नहीं जाने देता है। किंचित भी पर पदार्थ स्वीकार नही करना ही आकिचन है। उपाध्यक्ष अनिल जैन एवं संगठन मंत्री सुनील गंगवाल ने बताया कि गुरूवार को दशलक्षण पर्व का दसवां और अंतिम दिन है गुरुवार को जैन श्रद्धालु श्रद्धा_भक्ति के साथ “उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म“ और अनंत चतुर्दशी पर्व हर्षोल्लास के साथ मनायेगे। गुरुवार को जैन मंदिरों में अलग ही उत्साह देखने को मिलेगा, बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रीजी का कलशाभिषेक शांतिधारा कर पूजन विधान करेगे।अनंत चतुर्द्र्शी के अवसर पर मंदिर के प्रांगन में चोबीस तीर्थंकर भगवानों का भव्य पूज गीत – संगीत के साथ होगा। उसके बाद दोपहर मध्याह 12.15 बजे से पून्ह चोबीस तीर्थंकर भगवानो का पूजन प्रारम्भ होगा। जो संध्या से पूर्व सम्पन्न होगा जिसके बाद श्रीजी का कलशाभिषेक,शांतिधारा का आयोजन होगा और श्रीजी माल का आयोजन होगा। शुक्रवार को सभी त्यागी– व्रतियों का सामूहिक पारणा एवं सम्मान समरोह मुनि संघ सानिध्य में चातुर्मास समिति,समाज समिति एवं महिला मंडल द्वारा किया जायेगा। अध्यक्ष एमपी जैन ने बताया की गुरुवार को जैन धर्म के 12 वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी का मोक्ष कल्याणक के अवसर पर 12 किलो का निर्वाण लड्डू चढाया जायेगा। इससे पूर्व वासुपूज्य भगवान का पूजन किया जायेगा। गुरुवार को अनंत चतुर्द्र्शी के अवसर पर सभी दिगम्बर जैन श्रद्धालु अपने सभी प्रतिष्ठान,व्यापार एवं नोकरी पेशा लोग अवकाश रखकर निर्जल उपवास रखते और बड़ी संख्या में जिनेन्द्र आराधना करते है। रविवार 15 सितम्बर सामूहिक क्षमावाणी पर्व मनाया जायेगा।

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