कारगिल में शहीद हुए नसरूदीन को परिवार व् गांव के लोगों ने किया याद
July 27th, 2020 | Post by :- | 23 Views
नूंह मेवात , ( लियाकत अली )  ।  नूह जिले के पुन्हाना खण्ड  के हिंगनपुर गांव के शहीद नसरुदीन की शहादत पर भले ही देश भर के लोगों ने गर्व महसूस किया हो ,लेकिन केंद्र  से लेकर सूबे की सरकार ने जो वायदे परिवार से किये थे ,उन्हें आज तक भी पूरा नहीं किया गया है। परिवार के लोग इससे बेहद खफा हैं। शहीद के पुत्र इरशाद अली को आरटीओ दफ्तर नूह में नौकरी और छोटे बेटे की नौकरी सेना में पिछले साल 2016 में लग चुकी है। गत 13 अक्टूबर 2000 को नसरुदीन शहीद हुए थे। उस समय 24 राजपूत के नायब सूबेदार नसरुदीन अपनी 16 जवानों की टुकड़ी के साथ गश्त कर रहे थे ,उसी दौरान आतंकवादियों ने फायर शुरू कर दिया। जांबाज नसरुदीन की गोलियों से करीब पांच आतंकवादी ढेर हो गए ,लेकिन इसी दौरान एक गोली शहीद नसरुदीन  पर भारी पड़ी।
शहीद नसरुदीन की शहादत को सलाम करने और उसे अंतिम विदाई देने सूबे की चौटाला सरकार के मंत्री ,विधायक से लेकर गुड़गांव के डी सी अपूर्व कुमार सिंह सहित कई लोग पहुंचे और पार्क बनाने ,स्कूल का नामकरण करने ,शहीदी स्थल बनाने ,सड़क का नाम करण करने ,पेट्रोल पम्प से लेकर दोनों बेटों को नौकरी देने की बात उस समय भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने की थी।
शहीद नसरुदीन के छः बच्चे हैं। दो बेटे हैं इरशाद खान और मोहमद इकराम। इरशाद खान को 15 साल बाद नूह जिले के आरटीओ ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिली ,तो छोटा बेटा  मोहमद इकराम फतेहगढ़ उत्तर प्रदेश के सैनिक स्कूल में पढ़ने के बाद सैना में नौकरी मिली है। तीन बहनें हैं। तीनों  की शादी हो चुकी है। शहीद नसरुदीन  की पत्नी आयशा बेगम का कहना है कि सरकार ने जो वादे एवं  घोषणा की थी उनमे से एक बच्चे को नौकरी मिली है और ना ही  कोई सरकार प्रशासन की तरफ से कोई आर्थिक मदद की गई। उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस,व स्वतन्त्रता दिवस पर उन्हें व उनके पति को  सरकार व प्रशासन  याद करती है।
वहीं हिंगनपुर गांव के नम्बरदार याकूब के मुताबिक -शहीद नसरुदीन के नाम से शाहचौखा -हिंगनपुर सड़क का नामकरण तो हुआ लेकिन अब बोर्ड तक गायब हो चुका है। औथा हाई स्कूल का नामकरण भी शहीद नसरुदीन के नाम से किया गया ,लेकिन उसे रिकार्ड में दर्ज कर पटल पर लाने की कोशिश अधूरी रही। प्रशासन से लेकर सरकार तक का कोई ध्यान नहीं है।
परिवार ,समाजसेवियों ,ग्रामीणों के मुताबिक शहीद नसरुदीन की कब्र अब जमीदोज हो चुकी है। शहीद स्मारक नहीं बन पाया ,पार्क नहीं बन पाया ,पेट्रोल पम्प नहीं मिला ,स्कूल से लेकर सड़क तक का नामकरण तो हुआ परंतु सिर्फ नाम तक ही सीमित रह गया। सड़क से बोर्ड गायब हो गया तो स्कूल का नाम दस्तावेजों तक नहीं गया। आज इसी बात का सभी को मलाल है।

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