भाण्डीर वन में नन्दजी के द्वारा श्री राधाजी की स्तुति: श्री राधा और श्रीकृष्ण का ब्रह्माजी के द्वारा 🎺विवाह🎷; ब्रह्माजी के द्वारा श्रीकृष्ण का 🙏स्तवन तथा नवदम्पति की मधुर लीलाएँ।
July 21st, 2020 | Post by :- | 214 Views

*🌹जय श्री हरि🌹*             *🌹जय श्री हरि🌹*
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*📿🌳भाण्डीर वन में नन्दजी के द्वारा श्री राधाजी की स्तुति: श्री राधा और श्रीकृष्ण का ब्रह्माजी के द्वारा 🎺विवाह🎷; ब्रह्माजी के द्वारा श्रीकृष्ण का 🙏स्तवन तथा नवदम्पति की मधुर लीलाएँ।🌊🌊*

_*श्री नारद जी कहते हैं*- राजन ! एक दिन नन्द जी अपने नन्दन को अंक में लेकर लाड़ लड़ाते और गौएँ चराते हुए खिरक के पास से बहुत दूर निकल गये। धीरे-धीरे भाण्डीर वन जा पहुँचे, जो कालिन्दी-नीर का स्पर्श करके बहने वाले तीरवर्ती शीतल समीर के झोंके से कम्पित हो रहा था। थोड़ी ही देर में श्रीकृष्ण की इच्छा से वायु का वेग अत्यंत प्रखर हो उठा। आकाश मेघों की घटा से आच्छादित हो गया। तमाल और कदम्ब वृक्षों के पल्लव टूट-टूटकर गिरने, उड़ने और अत्यंत भय का उत्पादन करने लगे। उस समय महान अन्धकार छा गया। नन्द नन्दन रोने लगे। वे पिता की गोद में बहुत भयभीत दिखायी देने लगे। नन्द को भी भय हो गया। वे शिशु को गोद में लिये परमेश्वर श्री हरि की शरण में गये।_

उसी क्षण करोड़ों सूर्यों के समूह की सी दिव्य दीप्ति उदित हुई, जो सम्पूर्ण दिशाओं में व्याप्त थी; वह क्रमश: निकट आती-सी जान पड़ी उस दीप्ति राशि के भीतर नौ नन्दों के राजा ने वृषभानु नन्दनी श्रीराधा को देखा। वे करोड़ों चन्द्र मण्डलों की कांति धारण किये हुए थी। उनके श्री अंगों पर आदिवर्ण नील रंग के सुन्दर वस्त्र शोभा पा रहे थे। चरण प्रांत में मंजीरों की धीर-ध्वनि से युक्त नूपुरों का अत्यंत मधुर शब्द हो रहा था। उस शब्द में कांचीकलाप और कंकणों की झनकार भी मिली थी। रत्नमय हार, मुद्रिका और बाजूबन्दों की प्रभा से वे और भी उद्भासित हो रही थी। नाक में मोती की बुलाक और नकबेसर की अपूर्व शोभा हो रही थी। कण्ठ में कंठा, सीमंत पर चूड़ामणि और कानों में कुण्डल झलमला रहे थे।

श्री राधा के दिव्य तेज अभिभूत हो नन्द ने तत्काल उनके सामने मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा- ‘राधे ! ये साक्षात पुरुषोत्तम हैं और तुम इनकी मुख्य प्राणवल्लभा हो, यह गुप्त रहस्य मैं गर्गजी के मुख से सुनकर जानता हूँ। राधे ! अपने प्राणनाथ को मेरे अंक से ले लो। ये बादलों की गर्जना से डर गये हैं। इन्होंने लीलावश यहाँ प्रकृति के गुणों को स्वीकार किया है। इसीलिये इनके विषय में इस प्रकार भयभीत होने की बात कही गयी है। देवि ! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। तुम इस भूतल पर मेरी यथेष्ट रक्षा करो। तुमने कृपा करके ही मुझे दर्शन दिया है, वास्तव में तो तुम सब लोगों के लिये दुर्लभ हो’।_

_*🪔श्री राधा ने कहा*- नन्द जी ! तुम ठीक कहते हो। मेरा दर्शन दुर्लभ ही है। आज तुम्हारे भक्ति-भाव से प्रसन्न होकर ही मैंने तुम्हें दर्शन दिया है।_

_*🙏श्री नन्द बोले*- देवि ! यदि वास्तव में तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो तुम दोनों प्रिया-प्रियतम के चरणारविन्दों में मेरी सुदृढ भक्ति बनी रहे। साथ ही तुम्हारी भक्ति से भरपूर साधु-संतों का संग मुझे सदा मिलता रहे। प्रत्येक युग में उन संत-महात्माओं के चरणों में मेरा प्रेम बना रहे।_
_*🌈श्री नारद जी कहते हैं*- राजन ! तब ‘तथास्तु’ कहकर श्रीराधा ने नन्द जी को गोद से अपने प्राणनाथ को दोनों हाथों में ले लिया। फिर जब नन्दराय जी उन्हें प्रणाम करके वहाँ से चले गये, तब श्री राधिका जी भाण्डीर वन में गयीं। पहले गोलोकधाम से जो ‘पृथ्वी देवी’ इस भूतल पर उतरी थी, वे उस समय अपना दिव्य रूप धारण करके प्रकट हुई। उक्त धाम में जिस तरह पद्भराग मणि से जटित सुवर्णमयी भूमि शोभा पाती है, उसी तरह इस भूतल पर भी व्रजमण्डल में उस दिव्य भूमिका तत्क्षण अपने सम्पूर्ण रूप से आविर्भाव हो गया। वृन्दावन काम पूरक दिव्य वृक्षों के साथ अपन दिव्य रूप धारण करके शोभा पाने लगा।_

कलिन्दनन्दिनी यमुना भी तट पर सुवर्णनिर्मित प्रासादी तथा सुन्दर रत्नमय सोपानों से सम्पन्न हो गयी। गोवर्धन पर्वत रत्नमयी शिलाओं से परिपूर्ण हो गया। उसके स्वर्णमय शिखर सब ओर से उद्भासित होने लगे। राजन ! मतवाले भ्रमरों तथा झरनों से सुशोभित कन्दराओं द्वारा वह पर्वतराज अत्यंत ऊँचे अंग वाले गजराज की भाँति सुशोभित हो रहा था। उस समय वृन्दावन के निकुंज ने भी अपना दिव्य रूप प्रकट किया। उसमें सभाभवन, प्रांगण तथा दिव्य मण्डप शोभा पाने लगे। वसंत ऋतु की सारी मधुरिमा वहाँ अभिवयक्त हो गयी। मधुपों, मयूरों, कपोतों तथा कोकिलों के कलरव सुनायी देने लगे।_

*🔜क्रमशः*

*⚘🪔आचार्य श्री राधेशनन्दन गोस्वामी🪔⚘*

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