परीक्षा परिणाम नहीं हैं सफलता का पैमाना :- आर्यवीर लायन विकास मित्तल
July 11th, 2020 | Post by :- | 145 Views

पलवल (मुकेश कुमार हसनपुर) 11  जुलाई :-  दोस्तों परीक्षाओं के बाद अब मौसम आ गया है परीक्षा परिणामों का। आज के इस दौर में माता पिता अपने बच्चों से उनकी क्षमता से ज्यादा उम्मीद करने लगे हैं । अगर किसी जानकार का बच्चा अच्छे अंको से उत्तीर्ण होता है तो वे अपने बच्चे से भी वही उम्मीद करते हैं कि उनका बच्चा भी अच्छे से पढ़ाई करके अच्छे अंको से पास हों।

इसी वजह से बच्चों का  परीक्षा परिणाम आने के दौरान ज्यादा चिंतित होना स्वाभाविक है, परीक्षा परिणाम आने सें पूर्व यह सोचते रहते है  “नंबर कैसे आएंगे ?” और अगर खराब नंबर आये तो माता पिता, रिश्तेदार, अध्यापक और दोस्त सब मजाक उडाऐगें।

“निशान्त एक मेधावी विद्यार्थी है, परन्तु बारहवी कक्षा के परीक्षा परिणाम आने के पहले उसे बेचैनी होने लगी और साथ ही साथ उसे भूख कम लगने और जी घबराना आदि परेशानियों का सामना करना पड रहा है, जिसके कारण उसने घर से निकलना कम कर दिया, सारा दिन एक कमरे में बंद सोचता रहता है।“

अक्सर बच्चे निशान्त की तरह ही, भले ही उसने बड़ी मेहनत सें परीक्षाए दी हो परन्तु फिर भी वह चिंतित रहते है । आजकल बच्चों में यह समस्या समय के साथ और खतरनाक होती जा रही है और तो और इसी चिंता के चलते परीक्षा परिणाम आने के बाद कुछ बच्चे आत्महत्या जैसा खतरनाक कदम तक उठा लेते है।

दोस्तो सोचिये जिन मासुमों की आंखों ने अभी पूरी तरह सपने भी नहीं सजाए थे, वे हमेशा के लिए हमे छोड जाते हैं। इन मासूमों का यह कदम उनके माता पिताओ को कभी न मिटने वाला दर्द दे जाता है।  क्या जिंदगी से बड़ा है भविष्य का कैरियर?? क्या असफल हो जाने मात्र से ही बंद हो जाते हैं जिंदगी के सारे रास्ते ??  क्या परीक्षा में असफल होना इतना निन्दनीय है कि बच्चा अपना जीवन ही दांव पर लगा दे ।

बाल कल्याण समिति की सदस्या अल्पना मित्तल कहती है कि सब अपने कार्य में सफलता चाहते हैं लेकिन कभी भी जीवन कॊएक ही लक्ष्य से न बांधे साथ ही वो करें जो करना आपको अच्छा लगता है और जिसमे आपको अपने पर विश्वास है, तब देखिएगा सफलता खुद-ब खुद आपको मिलेगी लेकिन असफलता जीवन का अन्त तो बिलकुल भी नहीं है।

देश में प्रतिवर्ष हजारों बच्चे परीक्षा के तनाव या फिर उसमें असफल  होने पर आत्महत्या कर लेते हैं। जिस समाज में सफलता की पूजा होने लगे, वहाँ जाने-अनजाने में बच्चों से सफलता की मांग करने वाले अध्यापक, माता पिता, सभी न चाहते हुए मुखौटे लगाए हुए हत्यारे बन जाते हैं। ये सारी घटनाए उनके दबाव की वजह से ही होती हैं। असल में माता पिता आजकल अपने बच्चों से भविष्य को लेकर बहुत अधिक उम्मीदें रखने लगे हैं। हालाकि अपने अभिभावकों की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए बच्चे कठिन परिश्रम भी करते हैं लेकिन कई बार वह अपने माता पिता की उम्मीदों पर खरा नही उतर पाते हैं तो दुखी होकर इस तरह के गलत कदम भी उठा लेते हैं।

कही बच्चों में बढती आत्महत्या की प्रवृत्ति की वजह, उनके  जीवन में बढ़ रही निराशा, संघर्ष करने की घटती क्षमता तो नही हैं ? आज के भौतिकवादी माहौल ने माता पिताओं की उम्मीदों को काफी बढ़ा दिया है। ज्यादातर मांबाप  परीक्षाओं के अंकों को जिंदगी से जोड़ देते हैं। वही दूसरी तरफ जब उम्मीद से कम अंक पाने का सपना टूटता है और मां बाप की अपेक्षाएं पूरी नहीं होती हैं तो बच्चे अपने जीवन से ही निराश हो जाते हैं।

ऐसी परिस्थिति में माता पिताओं और अध्यापकों की जिम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों में आत्मविश्वास, जीवन के प्रति जिम्मेदारी का बोध और आगे बढऩे की इच्छा जागृत करें। उनको समझाया जाये कि कम अंक आने मात्र या परीक्षा में असफल हो जाने से जीवन खत्म नहीं हो जाता । प्रत्येक बच्चे में कुछ न कुछ प्रतिभा अवश्य छिपी होती है। हमारी जिम्मेदारी है कि उस प्रतिभा को पहचानकर उसके आगे बढऩे की राह सुझानी चाहिए। जिससे बच्चे के अन्दर आत्मविश्वास और आत्मसम्मान पैदा होगा और यही आत्मविश्वास उसके अन्दर जिंदगी के प्रति प्यार भी पैदा करेगा।

किसी ने सही कहा है :-

परेशानियों से भागना आसान होता है,

हर मुश्किल ज़िन्दगी में एक इम्तिहान होता है,

हिम्मत हारने वाले को कुछ नहीं मिलता ज़िंदगी में

और मुश्किलों से लड़ने वाले के क़दमों में ही तो जहाँ होता है!

परीक्षा परिणाम से उत्पन्न चिंता को नियंत्रित करने के उपाय :-

# हमे बच्चों के अन्दर परीक्षाओं में अच्छे अंक लाने का दबाव नही बनाना चाहिए। उन्हें यह महसूस न हो कि कि अगर उनके अंक कम आये तो उन्हें दूसरे भाई-बहनो की तुलना में कम प्यार मिलेगा । साथ ही साथ उनकी योग्यता को परीक्षा परिणाम के आधार पर ही न जाने।

# सामान्यत यह देखा गया है कि आपके बहुत सारे दोस्त और रिश्तेदारों होते है कि, जो सामान्य दिनों में बच्चों का हाल चाल नही पता करते बल्कि जानबूझकर परीक्षा परिणाम पता करने के लिए फ़ोन करते हैं, या मिलने के बहाने घर आकर परीक्षा परिणाम का पता करते हैं। यह सब बच्चे कों पसन्द नही आता बल्कि उसे यह महसूस होता हैं कि उसके प्रदर्शन को जाँचा जा रहा है, और वह तब और भी दुखी हो जाता है जब उसके अंक कम आते हैं। माता पिता के तौर पर, आप अपने बच्चों को ऐसे रिश्तेदारों से दूर रखें और उनको समझायें की ऐसे लोगों की बातों पर ध्यान न दें।

डेल कार्नेगी कहते है कि “असफलता से सफलता का सृजन कीजिये। निराशा और असफलता, सफलता के दो निश्चित आधार स्तम्भ हैं”।

#सबसे मुख्य बात है कि आप बच्चों के दिमाग में परीक्षा और उसके परिणाम को लेकर जो डर या दुविधा को दूर करके घर में एक बहुत अच्छा माहौल तैयार करे। जिससे उनके ऊपर से दबाव कम होगा और किसी से भी उनकी तुलना न करके उनका आत्मविश्वास बढ़ाए। पलवल डोनर्स क्लब “ज्योतिपुंज” के मुख्य संयोजक आर्यवीर लायन विकास मित्तल कहते है कि असफलता का ये मतलब नहीं है कि आप असफल हैं बल्कि इसका मतलब है कि आप अभी तक सफल नहीं हुए हैं।

# माता पिता को अपने बच्चों से हमेशा केवल पढ़ाई लिखाई की बाते न करे बल्कि उनसे उनके मन की बात जैसे उनके शौक, अभिरूचि और दोस्तों के बारे में भी बाते करे। माता पिता को यह भी ध्यान रखना पडेगा कि उनका बच्चा पढ़ाई के साथ साथ एक निश्चित समय पर खेलकूद, सुबह और शाम की सैर आदि भी करता है या नही ।

# माता पिता अपने बच्चे को यह विश्वास दिलाना होगा कि कोई बात नही, बच्चे ने तो अपना पूरा प्रयास किया है, उसके बावजूद अगर परीक्षा में अच्छे अंक नही आये है तो जीवन में अंक ही महत्वपूर्ण नहीं है, अभी उसको हिम्मत नही हारनी बल्कि भविष्य में निरन्तर प्रयास जारी रखने है। इससे बच्चे की चिंता भी कम होगी और वह फिर नए जोश से अपनी पढ़ाई शुरू कर सकता है।

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