कोविड में बददी बरोटीवाला में नहीं मिल रही उचित स्वास्थ्य सुविधाएं।।
July 3rd, 2020 | Post by :- | 57 Views
  •  श्रमिकों की दो लाख की आबादी स्वास्थ्य सुविधाओं से मरहुम
  • कम रेट के कारण पैनल पर लिए गए निजी अस्पतालों ने भी हाथ किए खडे
  • अकेले 6 बैड के बददी सीएचसी पर आ गया है समस्त कार्यभार
  • कोरोनो के चलते ईएसआई अस्पताल में नहीं हो पा रहा ईलाज
  • भूड़ डिस्पेंसरी भी भार उठाने में अक्षम
  • छोटी छोटी बीमारी को लेकर जाना पड रहा पडोसी राज्यों में

बददी, 3 जुलाई।राज कश्यप

एक तरफ कोविड-19 का कहर दूसरी ओर बददी में कार्यरत श्रमिकों को विभिन्न बीमारियां बन रही नासूर व जहर। प्रदेश सरकार ने बददी के ईएसआई मॉडल अस्पाल काठा को कोविड अस्पताल बना दिया था। उसी दिन से यहां पर लगभग दो लाख पंजीकृत मजदूरों के लिए इलाज की सुविधा बंद हो गई थी। हालांकि ईएसआई विभाग ने मजदूरों के इलाज के लिए कुछ निजी अस्पतालों को चिन्हित किया है लेकिन वो भी कोरोना के डर से सबका इलाज करने में सक्षम नहीं हो पा रहेे हैं। इसी कारण से मजदूर लोग भी प्राथमिक स्वाथ्य केंद्र बददी का रुख कर रहे हैं। वहां पर पूरे दिन स्थानीय लोगों के साथ ईएसआई में पंजीकृत व गैर पंजीकृत के साथ असंगठित क्षेत्रों श्रमिकों का तांता लगा रहता है। वहीं दूसरी ओर ईएसआई डिस्पेंसरी भुड (मलपुर) जो कि भोजिया डेंटल कालेज एवं अस्पताल के भीतर भी ईएसआई में पंजीकृत कामगारों को धक्के ही मिल रहे हैं। पूरे बीबीएन में अधिकांश उद्योगों में प्रोडक्शन शुरु हो गई तो मजदूरों का बीमार व चोटिल होना आम बात है और तनाव से अलग से उनको मिल रहा है।
भुड्ड डिस्पेंसरी का हाल
राज्य कर्मचारी बीमा निगम (ईएसआई) के भुड स्थित अस्पताल में मरीजों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। ओपीडी में मरीजों की लंबी-लंबी कतारें वस्तुस्थिति को बयान करती हैं। जहां एक और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों को दरकिनार किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर मरीजों को कोई भी सुनाई नहीं हो रही है। मरीज दवाई लेने के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं। कोई गार्ड नहीं लगाया गया, जो लोगों को लाइन में लगवा सके। ईएसआई भुड में अपने पिता का बिल जमा करवाने एक शख्स ने आपबीती सुनाते हुए कहा कि जिस कर्मचारी के पास बिल जमा करवाए जाते है, वह अपनी सीट पर ही घंटों तक गायब रहे, कुछ देर बाद आने के बाद फिर कोई बहाना बनाकर वह वहां से चले जाते ऐसा पूरा दिर चलता रहा। ओपीडी पर लेबर क्लास के लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न करते हुए एक दूसरे के साथ चिपके दिखे।

जिससे कोविड-19 महामारी को सीधे-सीधे आमंत्रण दिया जा रहा था। अस्पताल प्रशासन को चाहिए कि वह वहां कोई गार्ड तैनात करें ताकि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करवाया जा सके। डॉक्टर को दिखाने के लिए आए मरीजों को घंटों लंबी लाइन में लग कर पर्ची बनवानी पड़ रही थी। उमस भरी गर्मी में लोग बुरी से बेहाल हो रहे थे, अस्पताल प्रशासन को कोई भी कर्मचारी लोगों के साथ सहयोग नहीं कर रहा। जैसे-तैसे लोग पर्ची बनवा कर डॉक्टर तक पहुंच रहे थे। एक निजी कंपनी में एचआर मैनेजर के पद पर कार्यरत शिकायतकर्ता बलविंद्र सिंह लुबाणा ने बताया कि ईएसआई भुड में अव्यवस्था का आलम छाया हुआ है। आम लोगों की वहां कोई सुनवाई नहीं हो रही है। उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि लोगों की सुविधा के लिए बनाए गए इस अस्पताल में कोई उचित व्यवस्था बनाई जाए।

क्या कहते हैं ईएसआई एम.एस-
इस विषय में कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईसआईसी) मॉडल अस्पताल काठा के एम.एस (चिकित्सका अधीक्षक) आर.पी मीणा ने कहा कि ईएसआई काठा अस्पताल कोविड अस्पताल में परिवर्तित हो चुका है। जब तक जिला प्रशासन इसको कोविड में रखेगा तब तक हम कुछ नहीं कर सकते। जब यह इस प्रणाली से मुक्त होगा तो ही हम पूरा इलाज दे पाएंगे।

बहुत कम रेट पर कैसे हो ईलाज-डा. मुकेश

इस विषय मेें ईएसआईसी द्वारा पैनल किए गए एक अस्पताल मल्होत्रा सुपर स्पैशियिलिटी अस्पताल के निदेशक डा. मुकेश मल्होत्रा ने कहा कि ईएसआई ने हमें पैनल पर तो लिया है व ईएसआई मरीज़ों को हम हर तरह की सुविधा भी दे रहे है पर सुविधा देना इस कोविड के भयंकर समय में आसान नहीं है। डा. मल्होत्रा ने आगे बताया की अधिकांश ईएसआई के गर्भाधारण डिलीवरी के मरीज जब आधी रात को आते हैं तब ना तो उनका करोना टेस्ट हुआ होता और ना ही कोई टेस्ट की रिपोर्ट ही होती है। ऐसे में ईएसआई के पैकेज पर बिना पीपीई किट के व टैस्ट करवाए बिना खुद को व हॉस्पिटल के स्टाफ को जोखिम में डालना उचित नहीं है और पूरे बचाव व पीपीई किटस के प्रयोग के साथ ई.एस.आई के सरकारी रेट्स पर काम करना बहुत मुश्किल है।

हालांकि पिछले महीने में ईएसआई स्कीम में पंजीकृत लगभग दो दर्जन मरीज़ों की प्रसवा व सिज़ेरीयन आपरेशन कैश लेस सुविधा के तहत किए गए हैं और कोविड के टाइम में ईलाज पर हमारा खर्च बहुत ज्यादा आता है पर ईएसआई रेट तो तय है। यह अंतर पांच दस फीसदी न होकर बहुत ज्यादा है। ऐसे में हम भी क्या करें। उपर से ईएसआई निगम कहता है कि आप मरीज से एक भी रुपया चार्ज न करो और जो भी बिल है हमें सीधा क्लेम करो। वहीं दूसरी ओर हमारा स्टाफ भी कोरोना से डर से डयूटी पर बिना पूरे प्रिकोशन के काम करने से डरता है। हम लोगों की सेवा कर रहे हैं अपनी जान पर खेलकर।

इस के इलावा यह हॉस्पिटल सुपर स्पैशिलिटी हॉस्पिटल है व हम गंभीर ट्रीटमेंट जैसे प्लास्टिक सर्जरी , युरोलोजी के लिए इंपैल्ड नहीं है पर मरीज़ सब कैश लैस चाहते है जिसके लिए जब उच्च् अथॉरिटी से बात की तो उनका कहना है कि आप सुपरस्पैशिलिटी ट्रीटमेंट के लिए ईंपैनेलड नहीं है तो ऐसे में आप उनका इलाज ना तो पैसे ले कर कर सकते हैं क्योंकि आप के पैसे लिए हुए मरीजों का ना तो बिल ही पास होगा उल्टा आप को ब्लैक लिस्टेड किया जा सकता है। इस के इलावा रैफरल का सिस्टम भी ज्यादा लम्बा व कॉम्प्लिकेटेड है। डॉक्टर मुकेश मल्होत्रा ने कहा की मल्होत्रा हॉस्पिटल हिमाचल सरकार द्वारा चलाए जाने वाली हिम केयर व भारत सरकार द्वारा चल रही आयुष्मान भारत के तहत लगभग 500 मरीज़ों का इलाज कैशलैस सुविधा के तहत हर महीने करते हैं व उसका सिस्टम व पेमेंट इतना सहज है जबकि ई एस आई का सिस्टम उतना ही उलझा हुआ है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया की ईएसआई का रेफऱल सिस्टम समूथ हो या इसे भी हिम केयर पोर्टल /आयुषमान पोर्टल के साथ जोड़ दिया जाना चाहिए।

केस पर हम सात दिन बंद क्यों-डा गगन जैन

वहीं ईएसआई के पैनल पर दूसरे अस्पताल गगन अस्पताल के निदेशक डा. गगन जैन ने कहा हम अपने व अपने स्टाफ के रिस्क पर मरीजों को चैक कर रहे हैं। लेकिन जिस भी निजी अस्पताल में कोरोना का केस आता है उस अस्पताल को लगभग एक सप्ताह के लिए बंद कर दिया जाता है जबकि अगर सरकारी अस्पताल में कोई कोरोना पोसिटिव आता है तो उसको सिर्फ दो दिन के लिए बंद किया जाता है। इस हिसाब से हमें अस्पताल चलाने मुश्किल हो गए हैं।
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सरकार करे कोई व्यापक प्रबंध-सुरेंद्र अत्री

इस विषय में राष्ट्रीय मजदूर संघ (आर.एम.एस) के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुरेंद्र अत्री ने कहा कि केंद्र व प्रदेश सरकार की नीति ही सही नहीं है। जब बी.बी.एन में दो लाख के लगभग मजदूर ईएसआई में अशंदान दे रहे हैं तो उनके स्वास्थ्य से खिलवाड क्यों किया जा रहा है। पैसे देकर भी मरीजों को ईलाज नहीं मिल रहा है उनका कसूर क्या है। क्या सिर्फ उद्योग चला देना ही काफी है बाकी सोचना किसका काम है। अगर सरकारों ने अपना रवैया न बदला तो हमें सडकों पर उतर कर संघर्ष करना पडेगा। काठा अस्पताल को कोविड से मुक्त कर देना चाहिए और वहां के मरीज कहीं अन्य शिफट कर देना चाहिए ।।

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