क्या दूसरे विश्व युद्ध के बाद की दुनिया अब नहीं रहेगी?
May 8th, 2020 | Post by :- | 35 Views

किसी और चीज़ की तुलना में अगर किसी एक बात से हमारी दुनिया बदल जाती है, तो वो युद्ध है.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान साल 1945 की आठ मई यानी ‘यूरोप में जीत का दिन’, यक़ीनन वो दिन युद्ध का अंतिम अध्याय नहीं था.

जापान बुरी तरह से हार गया था, नाज़ी जर्मनी की फ़ौज ने मित्र देशों की गठबंधन सेना के सामने बिना किसी शर्त के हथियार डाल दिए थे.

और इतिहास एक नए युग में दाखिल हुआ, महाशक्तियों के बीच ताक़त के संतुलन के आधार पर एक नई विश्व व्यवस्था की दिशा में दुनिया ने ज़रूरी क़दम बढ़ाया.

लड़ाई ख़त्म होने के बाद अमरीका एक सैन्य सुपरपावर की तरह उभरा. परमाणु हथियारों के विकास के मामले में अमरीका रूस से आगे निकल गया.

नेटो का गठन

इसके बाद परमाणु शक्ति को ही दुनिया में ताक़तवर होने का पैमाने माना जाने लगा. रूस भी जल्द ही इस रेस में शामिल हो गया.

पूर्वी यूरोप पर अपने दबदबे को फिर से हासिल करने की रूस की चाहत ने कम विवादों वाली नई विश्व व्यवस्था के महत्वाकांक्षी सपने को चूर-चूर कर दिया.

इसी वजह से नेटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन) का गठन हुआ और अमरीका और पश्चिमी यूरोप के बीच सैन्य और कूटनीतिक मामलों को लेकर स्थायी जुड़ाव बन गया.

इसी हफ़्ते रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टिट्यूट (आरयूएसआई) की ओर से आयोजित वेबिनार (ऑनलाइन सेमीनार) में पत्रकार और इतिहासकार एनी एप्पलेबॉम ने ध्यान दिलाया कि “इस घटनाक्रम ने पश्चिम की अवधारणा को जन्म दिया. मूल्यों पर आधारित ये ऐसा गठबंधन था जो केवल सीमाओं को लेकर नहीं था बल्कि विचारों के बारे में भी था.”

शून्य से शुरुआत

लेकिन ऐसा केवल नेटो को लेकर नहीं कहा जा सकता है. जैसा कि प्रोफ़ेसर माइकल क्लार्क अंडरलाइंस याद दिलाते हैं कि संगठनों का एक पूरा नेटवर्क हुआ करता था.

प्रोफ़ेसर माइकल क्लार्क कहते हैं, “युद्ध के पहले अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का जो ढांचा हुआ करता था, उसका अब बहुत थोड़ा हिस्सा बचा हुआ है. इस बात को लेकर साल 1919 से भी ज़्यादा समझदारी थी कि एक नई विश्व व्यवस्था के निर्माण के लिए शून्य से शुरुआत करनी होगी.”

“संयुक्त राष्ट्र इस दिशा में एक प्रमुख उपलब्धि थी. फिर आया ब्रेटन वुड्स इकनॉमिक सिस्टम (अमरीका, कनाडा, पश्चिम यूरोप के देश, ऑस्ट्रेलिया और जापान के बीच कारोबार समझौता), विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष. ब्रिटेन इस पूरी प्रक्रिया में काफ़ी असरदार रहा लेकिन अमरीका की ताक़त निर्णायक थी.”

“तकरीबन सभी अंतरराष्ट्रीय संगठन इस बात पर निर्भर थे कि अमरीका उनकी स्थापना में कितनी दिलचस्पी लेता है और उन्हें कितना समर्थन देता है. पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले संगठन के दायरे से बाहर पचास और साठ के दशक में एक बहुत अलग किस्म की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था वजूद में आई. ये अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब दबाव में है क्योंकि इसकी राजनीतिक बुनियाद तेज़ी से बदल रही है.”

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