प्लाज्मा के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी :- डॉ तरुण विरमानी
April 19th, 2020 | Post by :- | 229 Views

 

हसनपुर पलवल (मुकेश वशिष्ट) :- आइए जानते हैं कि प्लाज्मा क्या है, क्योंकि इन दिनों हर कोई कोरोना वायरस के संक्रमण के इलाज के लिए प्लाज्मा थेरेपी के बारे में बात कर रहा है प्लाज्मा रक्त का हल्के पीले रंग का तरल होता है। ये थोड़ा क्षारीय होता है। प्लाज्मा साफ, पारदर्शी और आधारभूत तरल (मैट्रिक्स) है। ये रक्त का लगभग 55 से 60% भाग बनाता है। इसमें 90 से 92 प्रतिशत भाग पानी होता है और बाकी 8 से 10% भाग में कई कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थ मौजूद रहते हैं।

प्लाज्मा में पाए जाने वाले कार्बनिक पदार्थ – प्लाज्मा में सबसे ज्यादा मात्रा में प्लाज्मा प्रोटीन पाए जाते हैं जो मुख्य रूप से एल्ब्यूमिन, ग्लोब्यूलिंस, प्रोथ्रोम्बिन और फाइब्रिनोजन से मिलकर बने होते हैं। रक्त के परासरण दाब (ऑस्मोटिक प्रेशर) को निर्धारित करना इनका कार्य होता हैl ग्लोब्यूलिंस – ये एंटीबॉडीज की तरह काम करते हैं और हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस को नष्ट करते हैं। प्रोथ्रॉम्बिन और फाइब्रिनोजन – ये रक्त का थक्का जमाने में सहायता करते हैं। इनके अलावा हार्मोन्स, विटामिन, शर्करा, एमिनो अम्ल, वसीय अम्ल, एंटीबॉडीज और यूरिक अम्ल भी पाए जाते हैं। प्लाज्मा में पाए जाने वाले अकार्बनिक पदार्थ – इसमें सबसे ज्यादा मात्रा सोडियम बाइकार्बोनेट और सोडियम क्लोराइड की होती है।

ब्लड बैंक में ब्लड से तीन कंपोनेंट अलग किए जाते हैं। एक रेड ब्लड सेल, दूसरा ब्लड प्लेटलेट्स और तीसरा ब्लड प्लाज्मा। तीनों कंपोनेंट की अलग अलग अहमियत होती है। एल्बयूमींस शरीर में कैल्शियम लेवल मेंटेन करने और विभिन्न न्यूट्रीएंट्स जैसे लिपिड्स हारमोंस, विटामींस, मिनरल को इंसान के ब्लड सकुर्लेटरी सिस्टम से पूरे शरीर के अंगों में पहुंचाते हैं।

इससे इंसान का इम्यून सिस्टम विकसित होता है। ब्लड में 55 प्रतिशत एलब्यूमिन प्रोटीन, 38 प्रतिशत ग्लोब्यूलीन प्रोटीन, 7 प्रतिशत फाइब्रीनोजेन प्रोटीन सहित कुछ अन्य प्रोटीन शामिल होते हैं। ट्रांसफेरींस भी इसका एक मुख्य प्रोटीन होता है। कैंसर, डायबीटिज, टीबी, जले मरीजों के लिए इनसे ड्रग्स बनती हैं। ब्लड से प्लेटलेट्स भी अलग होते हैं जो एनीमिया (खून की कमी), डेंगू या मलेरिया रोग में उन मरीजों को चढ़ाए जाते हैं जिनमें इनकी कमी हो जाती है।

कहां से आया ये आइडिया

 प्लाज्मा थैरेपी को 120 साल पुरानी माना जा सकता है। 120 साल पहले जर्मन वैज्ञानिक एमिल वान बेहरिंग ने टेटनस और डिप्थीरिया का इलाज प्लाज्मा पद्धति से किया और प्लाज़्मा के सक्रिय पदार्थ का नाम ‘ऐंटीबाडी’ दिया। तब से आज तक प्लाज्मा थैरेपी का प्रयोग रेबीज, इबोला और नए कोरोना वायरस कोविड-19) से मिलते-जुलते  एमईआरएस और एसएआरएस के इलाज में भी हुआ है। उनके अनुसार, प्लाज्मा थैरेपी में जो मरीज अपनी प्रतिरोधी क्षमता से खुद ठीक हो गए हैं, उनके रक्त प्लाज्मा को गंभीर रूप से संक्रमित मरीजों को देने से उनके स्वास्थ्य में सुधार होता है।

अगर क्लिनिकल ट्रायल सफल होता है तो कोरोना से ठीक हो चुके मरीजों के रक्त प्लाज्मा से इस रोग से पीड़ित अन्य मरीजों का उपचार किया जा सकेगा। दरअसल जब कोई वायरस व्यक्ति पर हमला करता है तो उसके शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज कहे जाने वाले प्रोटीन विकसित करती है। अगर कोई संक्रमित व्यक्ति पर्याप्त मात्रा में एंटीबॉडीज विकसित करता है तो वह वायरस से होने वाली बीमारियों से उबर सकता है। यह चिकित्सा केवल गंभीर रोगियों के लिए लागू है|

 

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