महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर …..
February 22nd, 2020 | Post by :- | 127 Views

बचपन से यही सुना है, कि महाशिवरात्रि को ही माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह हुआ था।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं, परंतु भगवान शिव को ये मंज़ूर न था। फिर माता पार्वती ने घोर तपस्या की। अंततः शिव प्रसन्न हुए और माँ पार्वती के शादी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। शिव जी घोड़ी के बजाय नंदी बैल पर बैठ कर, भूत पिशाच की बारात ले कर, ब्याह रचाने पहुँच गए, वग़ैरह वग़ैरह…..

पौराणिक कथाएँ सांकेतिक होती हैं। उनके गूढ़ अर्थ होते हैं। पात्रों व कहानियों में उलझाकर, भाँति-भाँति के तरीक़े से, हमें सार्थक जीवन जीने का संदेश देती हैं, हमारा ज्ञान वर्धन करती हैं। क्यों न आज, महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर, हम भी इस त्योहार के मर्म पर विचार करें?

हम सभी प्राणियों के अंदर, दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण, एक कुंडलिनी शक्ति है, जो अनंतकाल से सोई हुई है। विद्युत शक्ति से भी कई गुना अधिक शक्तिशाली, ये शक्ति अगर जागृत हो गयी, तो आत्मा का परमात्मा से एकाकार हो जाता है, मन व अहंकार नष्ट हो जाता है, और व्यक्ति को अपने अंदर के शिव से साक्षात्कार हो उठता है – शिवोहम् शिवोहम् शिव-स्वरूपम्।

इस कुंडलिनी शक्ति का स्थान है मूलाधार चक्र, जो हमारी रीढ़ की हड्डी के मूल छोर पर अवस्थित है।

साथ ही, हमारे सिर के मध्य में, सैंकड़ों सूरज सी रौशनी लिए, हज़ार पंखुड़ियों वाला एक कमल भी है, जो सहस्रार चक्र कहलाता है, और जहाँ भगवान शिव का वास माना गया है। सहस्रार चक्र को शास्त्रों ने कई दिव्य सम्बोधनों से सम्बोधित किया है, जैसे सहस्र दल कमल, कैलाश पर्वत, क्षीर सागर इत्यादि। भगवान शंकर का कैलाश पर्वत पर तप करना भी इसी ओर इंगित करता है।

पुराण कहता है कि पार्वती ने घोर तप करके शिव को प्रसन्न किया। जब यम-नियम-आसान-प्राणायाम की साधना करते हुए, धारणा-ध्यान करते हुए, मूलाधार चक्र जागृत होता है, तो ये कुंडलिनी जो उमा, गौरी, या पार्वती भी है, सुषुम्ना मार्ग से सभी चक्रों का भेदन करते हुए, अपने शिव को मिलने, सहस्रार तक जाती है। शिव से इसी मिलाप या विवाह को समाधि कहा गया है।

कथा कहती है कि शिव जी नंदी बैल पर बैठ कर बारात ले कर आए। हमारी सुषुम्ना नाड़ी नंदी बैल है। हमारे शरीर के अंदर सुषुम्ना सबसे मुख्य नाड़ी है। इस नाड़ी में जब श्वास प्रवाहित होती है, तो वो योग की अवस्था कही जाती है।

शिव जी के संगी साथी भूत पिशाच थे। जब मूलाधार चक्र जागृत होता है, तो हमारे न केवल इस जनम के बल्कि करोड़ों जनमों के विकार भय, काम, क्रोध, घृणा, वासनाएँ इत्यादि जागृत हो जाते हैं। और जब शक्ति उर्ध्वगामी होकर शिव से मिलाप करती है तो जीव सभी पाशों से मुक्त हो जाता है।

हर पुरुष में स्त्री छुपी है। उसी तरह हर स्त्री में पुरुष छुपा है। जब जीवन में शिव तत्व का विकास होता है, उनका नियम व गुण आ जाता है, तो शक्ति स्वयं शिव से मिलन करती है। निष्ठापूर्वक ध्यान, योग, जप करने से कुंडलिनी, सारे चक्र को भेदकर, शिव से मिलन कर ही लेती है।

और एक दफ़ा, शक्ति का शिव से मिलाप हो गया, तो शक्ति फिर वापस अपने स्थान पर, जब भी लौटती है तो शिव को साथ लेते हुए ही आती है। अर्थात्, एक बार चेतना जागृत हो गयी, तो व्यक्ति बिना किसी बंधन में बंधे हुए, अपने सांसारिक कर्मों का पालन करता है और मोक्ष भी प्राप्त करता है।

आज महाशिवरात्रि पर शिव और उमा का ब्याह है, इसका मतलब है शक्ति और चैतन्यता का मिलन। तो आइए अपने शिव से मिलन के लिए एक सच्चा प्रयास करें।

आपकी शक्ति के शिव से ब्याह के लिए ढेरों शुभकामनाएँ…..

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