अहं का वीभत्स रूप
February 19th, 2020 | Post by :- | 191 Views

यूरोप के एक देश चेक रिपब्लिक की राजधानी है प्राग। यहाँ के ओल्ड टाउन हॉल की दीवार पर, एक विश्व प्रतिष्ठित खगोलीय घड़ी (ऐस्ट्रनामिकल क्लॉक) ‘ओरलोज’ लगी है। पर्यटक इसे घंटों निहारते हैं, पर इसे पढ़ कर समय बता पाना, हर किसी के बस में नहीं।

कहा जाता है, 1410 ई. में एक घड़ीसाज़ मास्टर हानुस ने इस घड़ी का निर्माण किया। मास्टर हानुस ने खगोलीय पिंडों (सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी इत्यादि) की आवाजाही(मूव्मेंट) को समझा और उसकी स्थिति के आधार पर ये घड़ी बनाई जो एक तरह से प्रिमिटिव प्लैनेटेरीयम जैसी दिखती थी।

इस घड़ी को पाकर प्राग नगर के काउन्सिलर्ज़ अहंकार में फूले न समाए – ‘दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत घड़ी हमारे शहर में है।‘ पर, दूसरे ही पल उन्हें ये डर भी सताया, कहीं वो घड़ीसाज किसी और शहर के लिए भी ऐसी अनूठी घड़ी न बना दे। बर्दाश्त नहीं हुआ। सही ग़लत की पहचान जाती रही। यूँ अंधे हुए कि एक रात उस घड़ीसाज को ही अंधा कर दिया। ताकि इस अजूबे पर सिर्फ़ उनके शहर का हक़ हो, और किसी का नहीं।

कहा जाता है, हमारे देश में भी एक मुहब्बत मैन हुए, मुग़ल बादशाह शाहजहाँ, जिंहोंने अपनी मुहब्बत लेडी मुमताज़ के प्यार में ताजमहल बनवाया। 1648 में जब ताजमहल तैयार हुआ, उसकी ख़ूबसूरती में शाहजहाँ की भी आँखें चुँधिया गयीं।

‘ये अजूबा मैंने बनवाया है। जिन मज़दूरों ने इसका निर्माण किया है, उनके हाथों एक और ताजमहल न खड़ा हो जाय’। बस, काट डाले उन बीस हज़ार मज़दूरों के हाथ, जिन्होंने दिन रात एक कर ताजमहल बनाया था।

ये दोनों उदाहरण अहम् का विभत्स रूप नहीं दर्शाते?

आपने जो कुछ भी आज बनाया, कल इससे बेहतर कुछ और बनाएँगे। कुछ इससे भी अच्छा करेंगे। ये प्रग्रेसिव सोच है।इस सोच को सलाम है। परंतु, रचनाकार के अस्तित्व को ही मिटा देने की सोच, ताकि वो कृति, जिस पर मेरा नाम लिखा है, दुबारा न बन सके – ये अहं का भयावह और निकृष्ट रूप नहीं तो क्या है? ये नाम पाने की हवस नहीं तो क्या है – जब व्यक्ति अपने आगे, हर किसी को दो कौड़ी का समझता है, उनके वजूद को सरेआम कुचलता है और उनकी लाश पर अपना नाम छाप कर, ज़ोर ज़ोर से अट्टहास करता है, “ये मैं हूँ, ये मेरा है”।

अपने आस पास हर आए दिन, हम लोगों को अपनी दौलत, शोहरत, ताक़त, पावर, नाम और रूप का शो ऑफ़ करते देखते हैं। ‘मैं’ और ‘मेरा’, सर पर सवार होते देखते हैं। मदमस्त हाथी की तरह नाम के लिए भटकते पाते हैं। इतिहास के पन्नों में अमर होने की चाहत लिए तरसते देखते हैं। पहले शरीर पर अपना नाम खुदवा दिया। फिर अपने कपड़ों में नाम जड़वा दिया। इमारत, सड़क, मूर्ति, सरेआम अपना नाम। अब्सेस्ट हो गए। फिर भी दिल भरा नहीं। सोचा, अब थोड़ा नेक कार्य हो जाय। अपने भगवान और गुरु की मूर्ति बनवाई, और उसपर भी अपना नाम जड़ दिया। पुण्य कार्यों के लिए दान दिया, दानकर्ता में अपना नाम रेजिस्टर करवा दिया। धर्मशाला, चबूतरे बनवाए, वहाँ भी अपना नाम घुसेड़ दिया।फिर भी संतोष नहीं मिला। अब कमज़ोरों और निहत्थों की ओर रूख किया। अपना बोलबाला बढ़ाया। अपने नाम से लोगों को काँपते देख मज़ा आने लगा। अहंकारी सिर्फ़ अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है। कोई और उसके आगे टिक नहीं सकता। और यहीं से, अहम् अपना विभत्स रूप धर लेता है। जो चीज़ मैंने बनाई भी नहीं, केवल बनवाई, उसपर भी सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना नाम लिखा देखने के लिए, बनाने वालों को ही ध्वस्त कर डाला। क्या ये ज़रूरी नहीं, कि हम अपने मन में प्रतिक्षण उठ रहे विचारों पर ग़ौर करें? हमारी भावनाएँ किसी अहं से प्रेरित तो नहीं, इस पर मनन करें? कहीं मेरे विचार मुझे अंधगति की ओर तो नहीं धकेल रहे? क्योंकि, अहंकार हमें सिर्फ़ और सिर्फ़ अंधकार, रोग-भोग और नरक की ओर ही घसीटेगा। सत्य, ज्ञान और पवित्रता से इसकी दूर की भी रिश्तेदारी नहीं। इतिहास गवाह है, ईश्वर की लाठी में आवाज़ नहीं होती। अच्छे अच्छों का अहंकार एक न एक दिन टूटता ज़रूर है।

लेखिका – अनुपम सिंह

कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे editorlokhit@gmail.com पर भेजें। इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है।