परोपकार से ही उद्धार संभव – आचार्य आनन्द पुरूषार्थी
February 17th, 2020 | Post by :- | 105 Views

चंडीगढ़(मनोज शर्मा) आर्य समाज सेक्टर 7 चंडीगढ़ में चल रहे 196 वें ऋषि दयानंद जन्म महोत्सव के पांचवें दिन आचार्य आनंद पुरुषार्थी ने कहा कि बताया के परोपकार मनुष्यता का सबसे बड़ा गुण है। हम सबको परोपकार करना चाहिए। इसी से परिवार, समाज एवं राष्ट्र का निर्माण होता है। संसार में जहां एक ओर स्वार्थी लोग होते हैं, वहीं दूसरी ओर परमार्थी लोग होते हैं। हमारी पंच महायज्ञ की परंपरा हम सबको ईश्वर का ध्यान, बड़ों का मान, अतिथि का सम्मान, पशु पक्षियों का भी ख्याल रखने बारे बताती है। हमें इस परंपरा को समाज में अधिक से अधिक प्रचारित और प्रसारित करना चाहिए। बंदूक की आवाज से भी तवे की आवाज अधिक होती है। माताएं भोजन बनाती हैं, आतिथ्य सत्कार करती हैं तो उस परिवार का यश दूर-दूर तक फैल जाया करता है। ठीक इसी प्रकार से जब हम घी आदि औषधियों का प्रयोग खुद के लिए करते हैं तो वह केवल हम तक पहुंचता है और जब यज्ञ में, हवन में उसकी आहुति दी जाती है तो 33 कोटि देवताओं तक वह है आहार पहुंच जाता है ।इसलिए अग्निहोत्र की परंपरा को घरों में अपनाना चाहिए। माता पिता की सेवा करनी चाहिए। ईश्वर का ध्यान प्रातः काल और सायंकाल अवश्य ही करें। पशु पक्षियों चीटियों अन्य कर्मियों आदि के लिए भी हमें दान करना चाहिए। यही हमारी परंपरा है, करुणा की परंपरा है, परोपकार की परंपरा है। एक ओर यह आर्य परंपरा, भारतीय परंपरा वहीं दूसरी ओर राक्षसी परंपरा है, स्वार्थ की परंपरा है, जो सब सभी पशु-पक्षियों को खा रही है, जिससे कोरोना जैसे रोग उत्पन्न हो रहे हैं। कोरोना जैसा यह रोग चीन के अंदर कितने ही हजार लोगों को लील चुका है। हमें ना केवल भारत में अपितु विश्व भर में वैदिक सभ्यता संस्कृति का डंका बजाना होगा। यह तभी संभव है जब हमारा जीवन वैदिक बने, जब हमारा जीवन सनातन परंपरा के आधार पर चले, पंच महायज्ञ की परंपरा के आधार पर चले। भजनोपदेशक विमल देव अग्निहोत्री जी ने भी सभी श्रोताओं को मधुर भजनों के माध्यम से मंत्रमुग्ध कर दिया एवं ऋषि दयानंद के पुरुषार्थ को जन-जन को बताया। इस अवसर पर केंद्रीय सभा के आर्य समाज सेक्टर 7 के मंत्री श्री प्रकाश चंद्र जी ने मंच का संचालन किया और चंडीगढ़ के लोगों से अधिक से अधिक संख्या में पहुंचने का आह्वान किया बताया कि 18 फरवरी को समापन होगा जिसमें प्रातः काल से ही उद्बोधन उपदेश प्रारंभ हो जाएंगे।

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