पूरे उत्तर भारत में धूमधान से मनाया जाता है लोहडी और मकर संक्राति का त्यौहार
January 12th, 2020 | Post by :- | 157 Views

– सिरमौर, सोलन और शिमला जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में ये पर्व आज के आधुनिक समय में भी पूरे पारंपरिक अदाज से मनाये जाते हैं….

लोहडी का त्यौहार वैसे तो पूरे उत्तर भारत मे धूमधान से मनाया जाता है मगर सिरमौर ,सोलन और शिमला जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में यह पर्व आज के आधुनिक समय मे भी पूरे पारंपरिक अदाज से मनाया जाता है। लौहडी वाले दिन गांव के बच्चे लकड़ियां एकत्रित करते हैं और संध्या के समय गांव के मंदिर परिसर या चौपाल मे अलाव जलाया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में घैना कहा जाता है और उसकी पारंपरिक पूजा की जाती है। इस अलाव को साक्षात अग्नि का रूप माना जाता है। भेट स्वरूप अग्नि देव को गेहूं ,भाग ,बाथु तिल और अखरोट का मूडा चढाया जाता है। इस पर्व को मनाये जाने के पीछे अलग अलग धारणाए हैं। ऐसा माना जाता है कि लोहडी की रात इस मौसम की सबसे सर्द रात होती है और यह पौष महीने की भी अंतिम रात होती है। लोग संध्या से समय सूर्य देव की पूजा अर्चना करते हैं कि हे सूर्य देव इस धरती को अपनी गर्म किरणों से ऐसा गर्म करो कि हमें इस प्रचंड ठंड से राहत मिल सके। सूर्य देव ने लोगों की इस प्रार्थना को स्वीकार किया और इस दिन से ठंड कम होनी आरंभ हो जाती है। माघ मास के शुक्ल पक्ष से ऋतू परिर्वतन हो जाता है और बंसत ऋतू आऱभ हो जाती है। एक अन्य जनश्रुति के अनुसार गाजीपूर क्षेत्र के एक ब्राह्ममण के घर एक कन्या थी जिसका नाम सुंदरी रखा गया क्योंकि वह इस क्षैत्र की सबसे सुंदर कन्या थी। क्षेत्र के राजा को जैसे ही इस बात का पता चला तो राजा ने उस कन्या को अपने महल में बुला लिया। राजा का आदेश सुन कर पंडित हैरान हो गया और उसने क्षेत्र के प्रसिद्व यौद्वा दुल्लाभटटी को इस कन्या की रक्षा के लिए बुलाया। दुल्ला भटटी ने भी ब्राह्ममण को इस कन्या की रक्षा का वचन दिया और कहा कि वह इस कन्या के लिए योग्य वर की तलाश करके उसका विवाह भी करा देगा मगर जब विवाह का समय आया तो दुल्लाभटटी के पास कन्या को देने के लिए कुछ नही था और उसने गुड और तिल से भरी एक पोटली कन्या को भेट स्वरूप प्रदान की । उधर राजा को इस बात का पता चल गया तो उसने दुल्लाभटटी पर आक्रमण कर दिया और दुल्लाभटटी ने राजा को परास्त कर दिया खुशी में अग्नि पूजा और एक सहभोज का आयोजन दुल्लाभटटी की ओर से किया गया। नयी नवेली दूल्हन सुंदरी के पास अग्नि देव को भेट करने के लिए कुछ नही था उसने भेट के रूप मे मिली उस गुड और तिल की पोटली को अग्नि देव को भेट कर दिया। ऐसा माना जाता है कि उसी दिन से इस पर्व को मनाने की परंपरा आरंभ हुई होगी ।

– मकर संक्राति विशेष….
सूर्य देव के बिना इस संसार की कल्पना नही की जा सकती और शायद यही कारण है कि हमारे शास्त्रों में सूर्य पूजा को अति आवश्यक माना गया है । शास्त्रों में जो वर्णन मिलता है उसके अनुसार सूर्य देव की उपासना से मानव को हर प्रकार के दुखों से मुक्ति मिलती है। सूर्य उपासना का सबसे उतम दिन मकर संक्राति को माना गया है। इस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस दिन को मकर संक्राति कहा जाता है और इस दिन से सूर्य उतर दिशा की ओर बढना आरंभ करते है ।शास्त्रों में इस प्रक्रिया को उतरायण कहा जाता है। उतरायण का समय हर कार्य के लिए शुभ माना जाता है। यहां सिरमौर सोलन और शिमला जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में मकर संक्राति का पर्व आज के आधुनिक समय में भी पारंपरिक अंदाज से मनाया जाता है। इस दिन पुरोहित अपने अपने यजमानो के घरों में जा कर परिजात जिसे स्थानीय भाषा में पाजा कहा जाता है के पत्तों गुड तिल और देशी घी से अपने यजमानो के चूल्हों का पूजन करते हैं। यहां इन दिनों परिजात ही ऐसा एक पेड़ होता है जिसमें हरियाली अपने यौवन पर होती है यानि इसके पते पूरी तरह हरे होते है और इस एवज में पुरोहित को यजमानों की ओर से यथा शक्ति दान दिया जाता है। ऐसा भी मान्यता है कि भागी रथ ने कठोर तपस्या के बाद मां गंगा को भछ लोक पर लाया था शायद इसी कारण इस दिन गंगा नदी के साथ साथ नदी नालों और झरनों तक में स्नान करने का बडा महत्व है । ऐसा माना जाता है कि इस दिन किया गया स्नान दान और पूजा पाठ कई हजारों गुणा फल देता है।

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