MSP पर फसल न खरीदने के षडयंत्र का हुआ पर्दाफाश भाजपा कर रही गेहूँ/धान पैदा करने वाले किसान से विश्वासघात । 2022 तक किसान की आय दोगुनी करना तो दूर, अब MSP भी नहीं मिलेगा ।
December 12th, 2019 | Post by :- | 150 Views

कालका (चन्द्रकान्त शर्मा)

रणदीप सिंह सुरजेवाला, मुख्य प्रवक्ता, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का बयान:-
MSP पर फसल न खरीदने के षडयंत्र का हुआ पर्दाफाश
भाजपा कर रही गेहूँ/धान पैदा करने वाले किसान से विश्वासघात ।
2022 तक किसान की आय दोगुनी करना तो दूर, अब MSP भी नहीं मिलेगा ।
किसानों को 2022 तक दोगुनी आय करने का झुनझुना दिखाकर सत्ता हथियाने वाली भाजपा सरकार अब किसान की ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ प्रणाली (MSP) ही खत्म कर उसे बाजारी ताकतों के रहमोकरम पर छोड़ने का घिनौना षडयंत्र कर रही है। दुर्भाग्य से हरियाणा की खट्टर सरकार किसानों से किए जा रहे धोखे की लैबोरेटरी बन गई है।
भाजपा सरकार यह भूल रही है कि देश की खाद्य सुरक्षा हरियाणा व पंजाब पर निर्भर है तथा खाद्यान्न के केंद्रीय कोटे में हरियाणा व पंजाब का (खास तौर पर गेहूँ की फसल) 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है। ज्ञात रहे कि 2019-20 रबी सीज़न में देश में 341.33 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न की खरीद हुई। इसमें से 222.30 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न अकेले पंजाब व हरियाणा ने दिया (पंजाब – 129.10 लाख मीट्रिक टन, हरियाणा – 93.20 लाख मीट्रिक टन)।
किसान की मेहनत की पीठ में भाजपा सरकार द्वारा खंजर घोंपने की साजिश सनसनीखेज तथ्यों से साबित होती है:-
1. प्रधानमंत्री ही किसान की फसल खरीद पर पाबंदी लगा रहे। भारत सरकार के फूड प्रोक्योरमेंट विभाग के संयुक्त सचिव की 18 अक्टूबर, 2019 की सनसनीखेज ईमेल से उजागर हुआ है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने FCI तथा भारत सरकार के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग से कहा:-
I) प्रधानमंत्री खाद्यान्नों की खरीद में कटौती करना चाहते हैं तथा खाद्यान्न पर दी जाने वाली सब्सिडी को कम करना चाहते हैं। इसकी पृष्ठभूमि सरकारी एजेंसियों द्वारा गेहूँ व धान की फसल की खरीद बारे है।
II) केंद्र सरकार के सेंट्रल पूल की खाद्यान्न खरीद केवल ‘जनवितरण प्रणाली’ (PDS) व अन्य तबकों (PDS/OWS) तक सीमित कर दी जाए।
III) प्रति एकड़ कितने क्विंटल खाद्यान्न खरीद हो, इसकी सीमा निश्चित की जाए। यह भी निश्चित हो कि कितने एकड़ भूमि से उपजी फसल की सरकारी एजेंसियों द्वारा खरीद की जाएगी।
IV) गेहूँ व धान की फसल उगाने वाले प्रांतों में गेहूँ व धान की बजाए दूसरी फसलों की खरीद के प्रोत्साहन बारे उठाए जाने वाले कदमों की व्याख्या करें।
उपरोक्त ईमेल की कॉपी संलग्नक A1 है।
2. भाजपा सरकार के ‘कृषि लागत और मूल्य आयोग’ (Commission for Agricultural Costs and Prices-CACP) ने भी 2020-21 की रबी मार्केटिंग सीज़न रिपोर्ट में गेहूँ व धान की सरकारी खरीद में कटौती की सिफारिश की।
अक्टूबर 2019 में जारी की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि:- “The government procured a large share of wheat production and market arrivals, about 73 per cent of production in Punjab and 80 per cent in Haryana, in Rabi marketing season 2019-20 (April-March). The Commission recommends that the open-ended procurement policy needs to be reviewed.”
साफ है कि भाजपा सरकार हरियाणा व पंजाब से गेहूँ तथा धान खरीदी पर पाबंदी लगाना चाहती है।
3. भाजपाई षडयंत्र का तीसरा पहलू ‘फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया’ (FCI) पर तालाबंदी है। भाजपा सरकार ने पाँच साल में FCI को खाद्यान्न सब्सिडी का पैसा देना ही लगभग बंद कर दिया। दो चौंकाने वाले तथ्य ये हैं कि:-
I) भाजपा सरकार द्वारा FCI को 1,74,000 करोड़ रु. आज भी देय है।
II) पाँच सालों में FCI का कर्जा 2,65,000 करोड़ रु. हो गया है।
III) इसमें से अधिकतर कर्ज 8 प्रतिशत या उससे अधिक ब्याज पर लिया गया है।
नतीजा यह है कि FCI पूरी तरह से कर्ज में डूब चुकी है। न तो भारत सरकार खाद्य सब्सिडी का पैसा दे रही और दूसरी तरफ भारी ब्याज पर लिए गए कर्ज को चुकाने का कोई रास्ता नहीं बचा। अगर FCI पर ताला लग जाएगा, तो किसान की खरीद कौन करेगा।
4. खट्टर सरकार ने पहले से ही किसान की फसल खरीद पर प्रति एकड़ 5 क्विंटल की सीमा लगाकर हरियाणा के किसान को बर्बादी की कगार पर ला खड़ा किया है। बाजरा, सरसों व सूरजमुखी आदि फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद 5 क्विंटल प्रति एकड़ से अधिक नहीं की जाती तथा उसका ब्यौरा भी अब पहले से ही ऑनलाईन दर्ज करवाना अनिवार्य कर दिया गया है। नतीजा यह है कि बाजरा व सरसों की फसलों में किसान को एमएसपी से 500 रु. से 800 रु. प्रति क्विंटल कम भाव मिला व किसान लुटा।
समय आ गया है कि दिल्ली की भाजपा सरकार व हरियाणा की भाजपा-जजपा सरकार जवाब दें।

कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे editorlokhit@gmail.com पर भेजें। इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है।