पीएलपीए में संशोधन बिल के विरुद्ध हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर मुख्य न्यायाधीश ने सरकार को किया नोटिस – 30 जनवरी 2020 को होगी अगली सुनवाई । बिल्डरों, वन-माइनिंग माफिया को फायदा पहुंचाने के लिए हरियाणा सरकार ने करा पीएलपीए में संशोधन : विजय बंसल
December 10th, 2019 | Post by :- | 78 Views

लोकहित एक्प्रेस कालका (चन्द्रकान्त शर्मा)

वन विभाग, हरियाणा सरकार ने 27 फरवरी 2019 को विधानसभा में पंजाब भूमि परिसंरक्षण अधिनियम 1900 (पीएलपीए) में संशोधन का बिल , राज्य सूची-भारतीय सविंधान की 7वी अनुसूची की वस्तु 18 के अंतर्गत पेश करके विधानसभा में सदन द्वारा पास किया जिसके बाद 11 जून 2019 को महामहिम राज्यपाल हरियाणा ने भी इस बिल को स्वीकृति देकर पास किया। इस संशोधन कानून के विरुद्ध, पीएलपीए के अंतर्गत क्षेत्रो में कोई निर्माण कार्य न करने व अवैध खनन को रोकने के लिए शिवालिक विकास मंच के अध्यक्ष विजय बंसल एडवोकेट ने माननीय हाईकोर्ट में चुनोती दी जिसपर सुनवाई करते हुए माननीय मुख्यन्यायधीश ने नोटिस ऑफ मोशन कर 30 जनवरी 2020 को अगली सुनवाई के आदेश दिए है। अधिवक्ता अमित झांझी ने विजय बंसल का पक्ष माननीय न्यायालय में रखा। इसी के साथ माननीय न्यायलय ने सभी वन क्षेत्रों में किसी भी तरह की नॉन फारेस्ट एक्टिविटी न होने के भी आदेश दिए है। आरटीआई में प्राप्त जानकारी के अनुसार अतिरिक्त मुख्य सचिव, वन विभाग व तत्कालीन स्पीकर विधानसभा ने 20 अगस्त 2019 को कहा कि इस संशोधन बिल पर राज्यपाल की सहमति आना विचाराधीन है परन्तु माननीय राज्यपाल ने रिकार्डनुसार 11 जून 2019 को ही इस बिल को सहमति दे दी।
विजय बंसल ने कहा कि पीएलपीए में संशोधन वन व वन्य प्राणियों की सुरक्षा तथा जनहित के विरुद्ध है, क्योंकि वस्तु 18 के अंतर्गत वन विभाग, हरियाणा सरकार सदन की पटल पर बिल पेश करने में सक्षम नही है। इंदिरा सरकार के समय 1976 मे सविंधान में 26 वा संशोधन किया गया था जिसमे अनुच्छेद 48 ए के अनुसार पर्यावरण की रक्षा व सुधार – वन तथा वन्य जीवन की सुरक्षा के लिए केंद्र व राज्य सरकार का संयुक्त दायित्व है क्योंकि वन समवर्ती लिस्ट में है।
पूर्व चेयरमैन विजय बंसल ने कहा कि हरियाणा सरकार ने 2006 में वन नीति बनाई थी जिसमे कहा गया था कि हरियाणा में वन क्षेत्र 6 प्रतिशत है,2010 में 10 प्रतिशत किया जाएगा तथा 2020 में 20 प्रतिशत किया जाएगा परन्तु अब तक केवल मात्र 3.5 प्रतिशत ही वन क्षेत्र हरियाणा में है। विजय बंसल के अनुसार यदि न्यायलय की शरण न लेते व सरकार द्वारा पीएलपीए में संशोधन पूरी तरह से लागू हो जाता तो हरियाणा में वन क्षेत्र केवल मात्र 2 प्रतिशत रह जाता। पीएलपीए 1900 हरियाणा के शिवालिक क्षेत्र व अरावली पहाड़ियों के 10 जिलों में लागू है व नान फारेस्ट एक्टिविटीस पर प्रतिबंध है।बिल पास होने से वन क्षेत्र में अवैध माइनिंग,पेड़ो का कटाव, भूमिगत जल स्तर गिरना, इमारतों का निर्माण होने से पर्यावरण प्रभावित हो जाता। सरकार द्वारा इस बिल से भू माफिया, बिल्डर्स को फायदा पहुंचाया जाना था।हाल ही में एक रिपोर्ट के अनुसार गुरुग्राम सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर है। विजय बंसल ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में जनहित याचिका नम्बर 20134/2004 दायर की थी जिसमें 2009 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा में अवैध माइनिंग पर प्रतिबंध लगा दिया था। विजय बंसल ने 2004 में पीएलपीए के आधार पर अवैध माइनिंग को बन्द करवाया था जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगाई थी।बंसल ने कहा की हरियाणा में 2009 से अवैध माइनिंग बन्द होगी थी परन्तु 2014 में भाजपा सरकार ने इसे खोल दिया जिससे अब हरियाणा में अवैध माइनिंग सरकार एवं खनन माफ़िया के गठजोड़ से ज़ोरों-शोरों से हो रही है। विजय बंसल ने बताया की सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय में कहा था जो भूमि वन विभाग के पंजाब भू-परिसंरक्षण अधिनियम 1900(पीएलपीए) के अधीन जिस भूमि के आरक्षित होने की अधिसूचना जारी हुई है, वन विभाग उस अधिसूचना को रद्द नहीं कर सकता।
विजय बंसल ने पत्रकारों को सम्बोधित करते हुए कहा कि हरियाणा सरकार को पीएलपीए में संशोधन करने का कोई अधिकार नही है, इसमें केवल राष्ट्रपति ही संशोधन कर सकते है। इससे पूर्व माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी हरियाणा सरकार को इस बिल में संशोधन करने पर लताड़ लगाते हुए कहा था कि हरियाणा सरकार कानून से ऊपर नही है, हरियाणा सरकार को वन व वन्य जीव का रखरखाव करना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि हरियाणा सरकार वन व वन्य जीवों को खत्म करना चाहती है तथा निजी चहेते बिल्डर्स को फायदा पहुंचाना चाहती है। माननीय न्यायालय ने हरियाणा सरकार को हिदायत दी है कि पीएलपीए में संशोधन बिल को पास न किया जाए परन्तु बावजूद इसके सरकार ने झुपते झुपते बिल को मंजूरी दे दी जिसके कारण माननीय हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया और अब 30 जनवरी को अगली सुनवाई होगी।

कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे editorlokhit@gmail.com पर भेजें। इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है।