विपरीत पर्यावरणीय परिस्थितियों के बाबजूद प्रवासी पक्षियों का शीतकालीन प्रवास के लिए आगमन शुरू: डॉ कौशिक
November 9th, 2019 | Post by :- | 162 Views

कुरुक्षेत्र, ( सुरेश पाल सिंहमार )    ।     सर्दी की आहट के साथ ही हरियाणा प्रदेश के प्राकृतिक तालाबों व जोहडों में प्रवासी पक्षियों के आने का सिलसिला शुरू हो गया है।

अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ब्रह्मसरोवर से मात्र पाँच किलोमीटर की दूरी पर स्थित सुनेहरी खालसा तथा ईशाकपुर में इन दिनों आप प्रवासी पक्षियों को अठखेलियाँ करते देख सकते हैं। राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय हथीरा के जीवविज्ञान प्राध्यापक डॉ तरसेम कौशिक ने बताया कि पिछले 20 वर्षों से सुनेहरी खालसा व ईशाकपुर के प्राकृतिक तालाब प्रवासी पक्षियों की पहली पसंद रहे है क्योकि यहाँ प्रवासी पक्षियों को पर्याप्त मात्रा में भोजन तथा सुरक्षित आवास उपलब्ध हो जाता है। डॉ तरसेम कौशिक ने बताया कि प्रवासी पक्षियों का प्रव्रजन आदिकाल से ही मनुष्य के लिये कौतुक का विषय रहा है। प्रवासी पक्षी हजारों किलोमीटर दूर स्थित अपने प्रजनन स्थल से उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों जैसे हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड के पोखरों, तालाबो, झीलों, नदियों में अपने शीतकालीन प्रवास के लिए आते हैं।

डॉ तरसेम कौशिक जोकि सालिम अली पक्षी-विज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केंद्र कोयंबटूर में बतौर पक्षी वैज्ञानिक काम कर चुके हैं, के अनुसार प्रवासी पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां जैसे फ्लैमिंगो, राजहंस, काटन टील, श्वेताक्ष पोचर्ड, ब्राह्मणी बत्तख, सूचिपूछ बत्तख, सामान्य टील, नीलपक्ष टील, मैलार्ड, गैडवल, विजियन, शिखी पोचार्ड, पिंकशीर्ष बत्तख, रक्तशिखी पोचार्ड, सरपट्टी सवन, सिलेटी सवन, तिदारी बत्तख, सिख पर बतख, बेखुर बतख, चेता बतख, नकटा, छोटी सिल्ही, करछिया बगुला, ग्लॉसी आईबिस, चमचा, घोंघिल इत्यादि इन दिनों हरियाणा के पोखरों, तालाबो, झीलों, नदियों में कलरव ध्वनियाँ व अठखेलियाँ करते दिखाई दे जायेंगी। डॉ तरसेम कौशिक के अनुसार ये प्रवासी पक्षी सुदूर प्रदेशों जैसे साइबेरिया, दक्षिणी चीन, रूस, कैस्पियन सागर, अफगानिस्तान, तिब्बत, लदाख तथा हिमालय की तलहटी से हजारों किलोमीटर की यात्रा कर भोजन की खोज में अपने शीत कालीन प्रवास के लिए आते हैं। डॉ कौशिक के अनुसार प्रवासी पक्षियों के प्रव्रजन का मुख्य काऱण इनके मूल निवास स्थान में अत्यधिक ठंड, तूफानी मौसम तथा अत्यधिक मात्रा में बर्फबारी का होना है जिसके कारण जलाशय, सरोवर तथा पोखर जम जाते हैं तथा पूरे क्षेत्र में भोजन की कमी हो जाती है। अतः प्रवासी पक्षी भोजन की खोज में हजारों किलोमीटर का सफर तय करते हए उत्तर भारत मे पहुँचते हैं।

डॉ तरसेम कौशिक के अनुसार हरियाणा के प्राकृतिक तालाबों में पिछले कुछ वर्षों में प्रवासी पक्षियों की संख्या में तेजी से कमी आई है। डॉ कौशिक के अनुसार प्रवासी पक्षियों की संख्या में कमी का मुख्य कारण प्राकृतिक तालाबों में मछली पालन, पानी का अत्यधिक गंदा होना, तालाबों में जलीय पौधौं की कमी, तालाबों के आसपास पेड़ों की कमी, तालाबों के किनारे पर अत्यधिक मात्रा में गोबर के उपले बनाना, तालाब में ह्यचीन्थ नामक पादप का पैदा होना, प्राकृतिक तालाबों में पशुओं को नहलाना तथा पानी पिलाना इत्यादि शामिल हैं।

डॉ कौशिक जोकि पिछले 15 वर्षों से प्राणी शास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ रोहतास चंद गुप्ता के निर्देशन में शोध कार्य कर रहे हैं, उन्होंने बताया कि ह्यचीन्थ नामक पौधे बहुत कम समय मे पूरे तालाब में फैल जाते हैं जिसके फलस्वरूप तालाब जल्दी ही सूख जाते हैं। इसके अतिरिक्त प्रवासी पक्षियों को रात के समय  बैठने के लिये पेड़ चाहिये। पेड़ों की कमी भी प्रवासी पक्षियों की संख्या में कमी करती है। प्रवासी पक्षी हजारों किलोमीटर का सफर करके भोजन की तलाश में आते है। अतः तालाबों में जलीय पौधों की कमी भी प्रवासी पक्षियों की संख्या में कमी करती है। मछली पालन की वजह से भी प्रवासी पक्षी हरियाणा के प्राकृतिक तालाबों से विमुख हुए है।

डॉ कौशिक ने कहा कि प्रवासी पक्षियों के संरक्षण व संवर्द्धन करने के लिए नितांत आवश्यक है कि सभी ग्राम पंचायतों के सरपंच ऐसे तालाब जहां प्रवासी पक्षी सर्दियों में अपने शीतकालीन प्रवास के लिये आते हैं उन्हें मछली तालाब में परिवर्तित न करे। इसके अलावा जैव विविधता से परिपूर्ण तालाब को उसकी मूल अवस्था में ही संरक्षित करे। तालाब के चारों तरफ अधिकाधिक संख्या में पेड़ लगाए जिससे न केवल पर्यावरण शुद्व होगा अपितु प्रवासी पक्षी भी संरक्षित हो सकेंगें। डॉ कौशिक ने कहा कि प्रवासी पक्षियों के प्रति जनमानस को जागरूक करने लिए प्रवासी पक्षियों से संबंधित पाठयक्रम हमारी पाठय पुस्तकों में सम्मिलित होने चाहिए। डॉ कौशिक ने कहा कि पेहोवा के थाना गाँव के प्राकृतिक तालाब की तर्ज पर ही सुनेहरी खालसा तथा ईशाकपुर के तालाबों का  भी संरक्षण करना चाहिए ताकि हजारों सालों से चली आ रही पक्षियों के शीतकालीन प्रवास की प्रक्रिया अनवरत जारी रह सके तथा हमारी आने वाली पीढियां भी इन भगवान के डाकियों के बारे में जान सकें।

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