कृषि विभाग ने जागरूकता अभियान के साथ दंडात्मक कार्यवाही शुरू की।
November 8th, 2019 | Post by :- | 75 Views

बराड़ा खंड के 29 कृषकों के चालान काटकर 72500 रुपए की राशि वसूल की।
अंबाला , बराडा ( गुरप्रीत सिंह मुल्तानी )
कृषि एवं कृषक कल्याण विभाग हरियाणा ने धान के अवशेष जलाने वाले किसानों के विरुद्ध जागरूकता अभियान के पश्चात दंडात्मक कार्यवाही शुरू कर दी है। खंड कृषि अधिकारी रोशनलाल, कृषि विकास अधिकारी डॉक्टर सुखबीर सिंह तथा पटवारी की टीम द्वारा क्षेत्र के अधीन मुलाना, मनका, मनकी, राऊमाजरा कम्बासी ऊगाला, खान अहमदपुर, सैहला, सरदहेडी सहित विभिन्न गांवों में पराली जलाने के दोषी 29 कृषकों के चालान काटकर 72500 रुपए की राशि वसूल की गई। कृषि अधिकारी ने बताया कि दंडात्मक कार्यवाही के साथ-साथ कृषकों को पराली जलाने से प्रदूषण, मित्र कीटों की क्षति तथा भूमि की उर्वरक शक्ति में उल्लेखनीय हृास की हानियां से अवगत करवाते हुए अवशेषों से देसी खाद तथा अन्य उपयोगी कार्य करने का परामर्श भी दिया गया। पराली जलाने वाले दोषी कृषकों को 2 एकड़ तक 2500 रुपए, 2 से 5 एकड़ तक 5000 रुपए तथा 5 एकड़ से अधिक की पराली जलाने पर 15000 रुपए का भारी जुर्माना भरना होगा। इसके अतिरिक्त जुर्माना अदा न करने पर दोषियों के विरुद्ध मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई आरंभ की जाएगी। सरकार व पर्यावरण विभाग समस्या के प्रति गंभीर है। पराली जलाने की सूचना देने वाले को 1000 रुपए का इनाम दिया जाएगा तथा सूचना देने वाले की पहचान गुप्त रखी जाएगी। विभागीय सूत्रों के अनुसार खरीफ मौसम की समाप्ति तक यह अभियान जारी रहेगा।

पराली जलाने से न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है बल्कि ऐसा करने से जमीन की उर्वरा शक्ति भी घट रही है। प्रदेश सरकार ने पराली जलाने पर रोक लगा रखी है। बावजूद इसके किसान खेतों में पराली जलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। बड़े किसान धान की कटाई मशीन से कराते हैं। कटाई के बाद जो अवशेष बचता है उसे किसान जमा करने की बजाय खेत में ही जला देता है। ऐसा करने से पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचता है। साथ ही भूमि में मौजूद पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। किसान के मित्र कहे जाने वाले केंचुएं व अन्य मित्र कीट भी जलकर नष्ट हो जाते हैं। पराली को जलाने से जहरीला धुआं वातावरण में फैलता है। कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों से आसमान में धुंध बनी रहती है। इससे आंखों और सांस संबंधी बीमारियां होने का खतरा रहता है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार पैदावार में भी 20 से 30 प्रतिशत कमी आती है।

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