श्री मद् भागवत कथा
August 24th, 2019 | Post by :- | 381 Views

*श्रीमद भागवत कथा के छठे दिन*

_श्रीकृष्ण रुकमनी विवाह का आयोजन हुआ जिसे धूमधाम से मनाया गया | भागवत कथा के छठे दिन कथावाचक श्री स्वामी हरिदास राधेशनन्दन जू ने रास पंच अध्याय का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि महारास में पांच अध्याय हैं। उनमें गाए जाने वाले पंच गीत भागवत के पंच प्राण हैं। जो भी ठाकुरजी के इन पांच गीतों को भाव से गाता है वह भव पार हो जाता है। उन्हें वृंदावन की भक्ति सहज प्राप्त हो जाती है। कथा में भगवान का मथुरा प्रस्थान, कंस का वध, महर्षि संदीपनी के आश्रम में विद्या ग्रहण करना, कालयवन का वध, उधव गोपी संवाद, ऊधव द्वारा गोपियों को अपना गुरु बनाना, द्वारका की स्थापना एवं रुक्मणी विवाह के प्रसंग का भावपूर्ण पाठ किया गया। भारी संख्या मे भक्तगण दर्शन हेतु शामिल हुये |_
_कथा के दौरान स्वामी जू ने कहा कि महारास में भगवान श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाकर गोपियों का आव्हान किया और महारास लीला के द्वारा ही जीवात्मा परमात्मा का ही मिलन हुआ। जीव और ब्रह्म के मिलने को ही महारास कहते है। रास का तात्पर्य परमानंद की प्राप्ति है जिसमें दुःख , शोक आदि से सदैव के लिए निवृत्ति मिलती है। भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों को रास के माध्यम से सदैव के लिए परमानंद की अनुभूति करवाई। भागवत में रास पंचाध्यायी का विश्लेषण पूर्ण वैज्ञानिक है,_

_श्री स्वामी हरिदास राधेशनन्दन जू (वृन्दावन वाले) ने कहा कि आस्था और विश्वास के साथ भगवत प्राप्ति आवश्यक है। भगवत प्राप्ति के लिए निश्चय और परिश्रम भी जरूरी है।श्री स्वामी हरिदास राधेशनन्दन जू ठा. श्री रमण विहारी जी के तत्वावधान में आयोजित भागवत कथा के छठे दिन कृष्ण-रुक्मणि विवाह प्रसंग पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण ने 16 हजार कन्याओं से विवाह कर उनके जीवन को सुखमय बनाया भगवान श्रीकृष्ण रूक्मणी के विवाह की झांकी ने सभी को खुब आनंदित किया। कथा के दौरान भक्तिमय संगीत ने श्रोताओं को आनंद से परिपूर्ण किया। भागवत कथा के छठे दिन कथा स्थल पर रूक्मणी विवाह के आयोजन ने श्रद्धालुओं को झूमने पर मजबूर कर दिया।_ _श्रीकृष्ण-रूक्मणी की वरमाला पर जमकर फूलो की बरसात हुर्इ।
पिछले छ: दिनों से चल रही भागवत कथा ने गद्दी सेवक स्त्री पुरूषों की दिनचर्या को ही बदल कर रख दिया है। जब से भागवत कथा प्रारम्भ हुई है। तब से लोग प्रात: काल जल्दी उठकर दैनिक कार्याे से निवृत होकर समय से पूर्व ही सत्संग स्थान में पहुंच जाते है।_

*संस्कार युक्त जीवन जीने से मिलती है मुक्ति…*
_कथावाचक ने कहा कि जो व्यक्ति संस्कार युक्त जीवन जीता है वह जीवन में कभी कष्ट नहीं पा सकता। व्यक्ति के दैनिक दिनचर्या के संबंध में उन्होंने कहा कि ब्रह्म मुहूर्त में उठना दैनिक कार्यों से निर्वत होकर यज्ञ करना, तर्पण करना, प्रतिदिन गाय को रोटी देने के बाद स्वयं भोजन करने वाले व्यक्ति पर ईश्वर सदैव प्रसन्न रहता है।_
*इस दौरान कृष्ण-रुक्मणि विवाह की झांकी सजाई गई।*

_स्वामी जू ने कहा कि, आज सारे लोग धन के पीछे अपना समय व्यर्थ कर रहे हैं, धन इतना जरूरी नही जितना हमने बना दिया है, उन्होने कहा धनेसा होना चाहिए जो मरने के बाद भी काम आए। स्वामी जू ने कहा कि, इस धप से हम सिर्फ विवासिताएं पूरी करते हैं परन्तु ईश्वर नाम रूपी धन ही असली धन है वह सब कुछ दे सकता है हमे।_
_जरा सोचे ऐसा क्या है जो प्रभु नामरूपी धन से अर्जित नहीं किया जा सकता और जरा सोचे की ऐसी कौन सी जगह है जहा पर यह प्रभु नामरूपी नहीं चलता | यह महाधन यमलोक, नर्क में भी चलता है क्योंकि इसी नामरूपी धन के बल पर ही वहाँ से हमारी मुक्ति संभव होती है |_

  • *विन्रम निवेदन*
    _आज कथा का अन्तिम दिवस है असके पश्चात भण्डारे की व्यवसथा की गयी है। कृप्या सभी हरि भक्त अवश्य आएं।_
    *श्री हरिदास*

कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे editorlokhit@gmail.com पर भेजें। इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है।