छठ पर्व के पीछे की पौराणिक मान्‍यता
November 4th, 2019 | Post by :- | 132 Views

एनसीआर लोकहित एक्सप्रेस (दोयल बोस/गौरव शर्मा)

“बिहार का आस्थापूर्ण लोकपर्व छठ”

भारत के अहम पर्वों में से एक छठ प्रत्‍येक वर्ष शुक्ल पक्ष में षष्ठी तिथि को मनाया जाता है. इसलिए इसे छठ महापर्व कहा जाता है. यह पर्व चतुर्थी से सप्तमी तक चलता है. छठ पर्व सबसे कठिन व्रतों में से माना गया है. इस व्रत को महिलाएं ही नहीं, पुरुष दोनों कर सकते हैं. स्त्रियां अपने सुहाग और बेटे की रक्षा करने के लिए भगवान सूर्य के लिए 36 घंटों का निर्जला व्रत कर भगवान सूर्य से धन-धान्य, समृद्धि की कामना करती हैं.

लोक आस्था का पर्व छठ पिछले कुछ दशक में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से बाहर निकलकर देश के दूसरे भागों में भी अपनी गरिमामयी मौजूदगी दर्ज करा रहा है. इसमें घाटों पर छठ मइया की आस्था से जुड़ी परंपराओं का संगम उमड़ा नजर आता है. छठ पर्व की शुरुआत नहाय खाय के साथ होती है. दूसरे दिन खरना में खीर का प्रसाद चढ़ता है. तीसरे दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं. पर्व का समापन सूर्यदेव के दर्शन के साथ होता है.

महत्व

सूर्य की पहली किरण जैसे ही जीवनदायिनी गंगा नदी की पवित्र लहरों को छूती है. व्रतियों की आंखों में भक्ति की लालिमा उतर जाती है. हाथ उठाकर जल का अर्ध्य दिया जाता है और किरणें जल को स्‍पर्श करतीं हैं तो मानों जैसे सूर्यदेव स्‍वयं आगे बढ़कर अर्घ्य को ग्रहण कर लेते हैं.

बीती रात से इस सुबह की प्रतिक्षा कर रहे श्रद्धालुओं के कदम तीसरा पहर शुरु होने से पहले ही स्वयं गंगा घाट की तरफ उठने लगते हैं. कोई शांत चित से तो कोई ढ़ोल नगाड़े के साथ. कोई षाष्टांग दंडवत करते हुए घाट तक पहुंचा. यह दृश्य सचमुच अविस्मरणीय होता है.

36 घंटों से निर्जला व्रती कमर त‍क पानी में रहते हुए आसमान को ताकते रहते हैं. कि कब सूर्यदेव के दर्शन मिल जाएं और अर्ध्‍य दिया जा सके. मान्‍यता है कि आमतौर पर अर्ध्य के वक्त सूर्यदेव कुछ देरी से निकलते हैं. कई बार देखा गया है कि कोहरा उन्हें देर के लिए अपने आप में ढ़क-सा लेता है. हालांकि सूर्यदेव श्रद्धालुओं को ज्यादा देर नहीं इंतजार करवाते.

कौन है छठी मईया जिनकी होती है पूजा
इस व्रत में माता छठी की पूजा की जाती है. वेदों के अनुसार भगवान सूर्य देव की पत्नी उषा यानी की छठी माता की पूजा की जाती है. साथ् ही इस दिन सूर्य देव की विशेष पूजा का विधान है. इस पूजा के द्वारा सूर्यदेव को धन्यवाद दिया जाता है,जिनकी कृपा से ही इस पृथ्वी पर जीवन संभव हो पाया है और जो हमें आरोग्य प्रदान करते हैं. भगवान सूर्य देव ही एकमात्र ऐसे देव है जिन्हें हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं.

कथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा थे. उनकी पत्नी का नाम मालिनी था. दोनों की कोई संतान नहीं थी. इस बात से राजा और उसकी पत्नी बहुत दुखी रहते थे. उन्होंने एक दिन संतान प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया. इस यज्ञ के फलस्वरूप रानी गर्भवती हो गईं.

नौ महीने बाद संतान सुख को प्राप्त करने का समय आया तो रानी को मरा हुआ पुत्र प्राप्त हुआ. इस बात का पता चलने पर राजा को बहुत दुख हुआ. संतान शोक में वह आत्म हत्या का मन बना लिया. लेकिन जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक सुंदर देवी प्रकट हुईं.

देवी ने राजा को कहा कि मैं षष्टी देवी हूं. मैं लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूं. इसके अलावा जो सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है, मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण कर देती हूं. यदि तुम मेरी पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी. देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया.

पर्व के पीछे की पौराणिक मान्‍यता
छठ पर्व उतना ही पुराना है जितनी मनुषय की आस्था. ये सूर्य षष्ठी के त्यौहार का उत्सव है. लोक मान्यताओं के अनुसार सूर्य षष्ठी या छठ व्रत की शुरुआत रामायण काल से हुई थी. इस व्रत को सीता माता समेत द्वापर युग में द्रौपदी ने भी किया था. एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी. सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की. कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था. वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता. सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था. आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है.

छठ पर्व के संदर्भ में एक कथा यह भी है कि जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा. तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया. लोक परंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मईया का गहरा संबंध है. लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी.

क्‍यों दिया जाता है अर्घ्‍य

छठ पर्व सूर्य की आराधना का पर्व है और कहा जाता है कि सूर्य की शक्तियों का मुख्य स्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं. इसलिए छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की भी संयुक्त आराधना होती है. सुबह के समय यानि चौथे दिन सूर्य की पहली किरण यानि ऊषा और शाम के समय यानि तीसरे दिन सूर्य की अंतिम किरण यानि प्रत्यूषा को अर्घ्य देकर दोनों का नमन किया जाता है.

लाभ

कार्तिक मास में भगवान सूर्य की पूजा की परंपरा है, शुक्ल पक्ष में षष्ठी तिथि को इस पूजा का विशेष विधान है. कार्तिक मास में सूर्य नीच राशि में होता है अतः सूर्य देव की विशेष उपासना की जाती है, ताकि स्वास्थ्य की समस्याएं परेशान ना करें. षष्ठी तिथि का सम्बन्ध संतान की आयु से होता है अतः सूर्य देव और षष्ठी की पूजा से संतान प्राप्ति और और उसकी आयु रक्षा दोनों हो जाते है. इस माह में सूर्य उपासना से वैज्ञानिक रूप से हम अपनी ऊर्जा और स्वास्थ्य का बेहतर स्तर बनाये रख सके.

माना जाता है कि प्रात: काल सूर्य की आराधना से स्वास्‍थ्‍य बेहतर होता है. दोपहर में सूर्य की आराधना से नाम और यश बढ़ता है. शाम के समय सूर्य की आराधना से जीवन में संपन्नता आती है.

उगते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा कई व्रत-त्योहारों में है, लेकिन डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा केवल छठ व्रत में है. कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की षष्ठी को ढलते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है.

ज्योतिष के जानकारों की मानें तो अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा में समस्याओं को दूर करने की शक्ति होती है. ढलते सूर्य को अर्घ्य देना कई मायनों में लाभकारी होता है.

छठ का त्योहार दीपावली के बाद होता है. दीपावली के दौरान साफ-सफाई के बाद जो भी कूड़ा-कचरा होता है उसे साफ करके दीवाली के पहले शुरू किए गए स्वच्छता को जारी रखा जाता है. इस तरह देखा जाए तो छठ स्वच्छता पवित्रता का त्योहार है.

बहुत कठि‍न होता है ये व्रत

छठी मईया का ये व्रत बहुत कठ‍िन होता है, लेकिन आस्था की भावनाओं के आगे हर मुश्किल आसन हो जाती है. ये अदभुत ही है कि जब पूरा संसार भौत‍िकतवाद में जकड़ा जा रहा है, इस महापर्व के अनुयाई सारी सुख-सुविधाएं त्यागकर अपनी मर्जी से करते हैं. अगर निर्जला व्रत की कुल अवधि से खरना वाले प्रसाद को एक तरफ कर दिया जाए तो ये व्रत करीब 54 से 55 घंटों का होता है. जिसमें व्रती न तो अन्न ग्रहण करता है न जल ग्रहण करता है.

ये कठिन व्रत सभी नहीं कर सकते, लेकिन व्रती के सूप पर अर्ध्य चढाकर पुण्य जरूर कमाया जा सकता है.

समय के साथ बदला स्‍वरूप
पारंपरिक तौर पर छठ का पर्व गंगा के घाटों में मनाया जाता रहा है, लेकिन इसमें यमुना की आस्था भी सम्‍म‍ि‍लित हो चुकी है. ब‍िहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में पूरी आस्था से मनाया जाने वाला पर्व है. लेकिन यहां के निवासियों के देश के दूसरे भागों में रहने और नदियों-घाटों की अनुपलब्‍ध्ता के चलते वैकल्‍पिक व्यवस्‍था को ग्रहण कर लिया गया है. शहरों में महापर्व के लिए स्थानीय प्रशासन पानी के कुंड बनाने जैसे इंतजाम करता है. साथ ही सुरक्षा के लिए पुलिस समेत दूसरे विभाग भी तैनात रहते हैं ताकि व्रतियों को किसी तरह की असुविधा न हो. जगह की कमी की वजह से कई लोग अपने-अपने छतों से भी सूर्यदेव को अर्ध्य देते हैं. इतना ही नहीं, अब तो छठ पर्व के दौरान अपने घरों को लौटने वालों की सुविधा को देखते हुए स्पेशल ट्रेन भी चलाई जाने लगी हैं.
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लेखक – राहुल झारिया
नोएडा।

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