फिर जागे तालाब, जिंदगी की बुझेगी प्यास
October 1st, 2019 | Post by :- | 122 Views

अम्बाला, ( सुखविंदर सिंह ) तालाब..। या यूं कहें, जीवन का आधार। हमेशा संस्कृति से लेकर समृद्धि इन्हीं तालों पर ही निर्भर रही। सिमट रहे तालाबों पर युवा समाज सेवा संघ (क़ुर्बानपुर )अम्बाला ने प्रशासन के साथ ही ग्रामीणों को भी झकझोरा। साथ ही, जागरूक किया कि अगर तालाब नहीं बचेंगे तो पशुओं से लेकर आमजन तक पानी के लिए तरस जाएंगे। युवा समाज की पहल पर ही गांवों में पंचायतों ने तालाब बचाने के लिए प्रस्ताव पास किए।
साथ ही, कुछ तालाबों पर काम भी किया। कब्जे हटवाए। इसका असर ये हुआ कि मानसून के सीजन में यहां बारिश के दौरान पानी भरने लगा है।

एक एकड़ से ज्यादा के 380 जोहड़ गांवों से गायब हो चुके हैं : कंकरीट के जंगल में तब्दील हो रहे गांवों में जोहड़ भूजल रिचार्ज की एक उम्मीद को जिंदा रखे हुए थे, लेकिन 10 साल के भीतर प्रदेश के छह हजार गांवों से 380 जोहड़ गायब हो गए हैं। जोहड़ों पर निर्माण कर दिया गया है। जो जोहड़ बचे हैं, उन पर दबंगों की नजर है। जोहड़ों के लिए काम कर रही संस्था आकृति के अध्यक्ष अनुज सैनी ने बताया कि यह भूजल रिचार्ज का ऐसा माध्यम था, जो खुद से खुद के लिए बना था।

इसलिए हो गए कब्जे

करीब 20 साल पहले सबमर्सिबल और छोटे पंप आ गए। शहर से लेकर गांव तक पानी की सुविधा के लिए इसका चलन शुरू हो गया। जोहड़ का प्रयोग पशुओं तक सीमित रह गया। धीरे-धीरे जोहड़ की गहराई कम होती गई। गंदगी जमा होने लगी। प्रयोग होने से इस पर कब्जा कर लिया गया या फिर मिट्टी डालकर सड़क बना दी गई।

इसलिए तालाब जरूरी

बारिश का पानी तालाब में संरक्षित रहता था। गांव को भी अपनी जरूरत के मुताबिक पानी यहां से मिल जाता था। जब गांव में घर कच्चे होते थे तो जोहड़ की मिट्टी खासी उपयोगी साबित होती थी। इस तरह से जोहड़ से मिट्टी भी निकलती रहती थी।

इससे इनका अस्तित्व बना रहता था। अब गांव में जोहड़ की मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता।

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