मनुष्य को धर्म व धर्मसंकट के बीच का अंतर समझाती है गीता : देवदत्त पटनायक
December 10th, 2021 | Post by :- | 75 Views

कुरुक्षेत्र, ( सुरेश पाल )   ।       कर्म से संसार का निर्माण होता है। धर्म आसान है लेकिन इसे कठिन बनाया जाता है। मनुष्य को धर्म व धर्मसंकट के बीच का अंतर गीता से मिलता है। गीता का संदेश है कि श्रीकृष्ण ने धर्मस्थापना की लेकिन गांधारी से वंशहीन होने का श्राप भी मिला। समुद्र मंथन में अमृत के साथ जहर भी निकलेगा। आशीर्वाद के लिए भोग लगाना नितांत आवश्यक है। वेद, पुराण, रामायण, महाभारण सहित सभी धार्मिक ग्रंथ जीवन यापन व जनकल्याण का संदेश देते है, लेकिन अहंकार से केवल एक स्थान तक सीमित रह जाते है। गीता की समझ के लिए कथा की समझ आवश्यक है। उक्त विचार लेखक देवदत्त पटनायक ने कुरूक्षेत्र विष्वविद्यालय के जनसंचार एवं मीडिया प्रोद्योगिकी संस्थान द्वारा अंतर्राष्ट्रीय गीता संगोष्ठी के अंतर्गत आयोजित प्लेनरी सेशन में बतौर मुख्य वक्ता व्यक्त किए।

अमेरिका से वुडबरी विश्वविद्यालय के प्रो. सतींद्र धीमान ने कहा कि गीता ही आदि व गीता अंत है। गीता समत्व व अर्पण भाव के साथ जनकल्याण के लिए कार्य करने का संदेश देती है। गीता रिटायरमेंट प्लान नहीं है, बल्कि पूरे जीवन को जीने का तरीका सिखाती है। गीता गृहस्थ जीवन में पालन करने का ग्रंथ है केवल सन्यासी जीवन तक सीमित नही है। प्रो धीमान ने कहा कि ज्ञान के बगैर मुक्ति नहीं हो सकती। गीता ही ज्ञानयोग, कर्मयोग व भक्ति योग को अपनाने का संदेश देती है। आमतौर पर भाषणों में सही कार्य करने व सही मार्ग पर चलने का संदेश दिया जाता है, लेकिन सही व गलत क्या है इसकी पहचान श्रीमद्भगवतगीता का अनुसरण करने से होती है। इतना ही नही गीता किसी पर अपने विचार थोपने की अनुशंसा नहीं करती, बल्कि व्यक्ति को अपने अनुसार किसी मार्ग को चुनने की स्वतंत्रता प्रदान करती है।

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प्रो. धीमान ने कहा कि गीता को समझने के लिए तीव्र दृष्टि की नहीं अपितु सूक्ष्म दृष्टि की जरूरत है। राष्ट्र निर्माण में व्यक्ति के कर्तव्य गीता समझाती है। गीता के माध्यम से ज्ञान दृष्टि को बढ़ाकर ही प्रत्येक व्यक्ति विश्व गुरू भारत के लक्ष्य को पूरा करने में अपना योगदान दे सकता है। गीता कर्म या फल नहीं बल्कि पूरी प्रक्रिया पर केंद्रित धार्मिक ग्रंथ है। दूसरे सत्र में मुख्य वक्ता लेमार विश्वविद्यालय अमेरिका के प्रो. वीएस नटराजन ने कहा कि गीता लोककल्याण के लिए धर्म, स्वधर्म व स्वकर्म का संदेश देती है। गीता सभी के लिए एकसमान रूप से क्रियांवित नहीं होती, बल्कि हर किसी को अपने अनुसार गीता के संदेशों व उपदेशों को अपनाकर जनकल्याण के लिए कार्य करने को प्रेरित करती है। श्रीमद्भगवत गीता आहार ग्रहण करने से लेकर आम जीवन में व्यवहार करने तक के बेहतर तरीके से अवगत कराती है।

प्रो. नटराजन ने कहा कि गीता व्यक्तिगत इच्छाशक्ति व क्षमता को राष्ट्र निर्माण में लगाने को प्रेरित करती है। गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को सीधा युद्ध लडऩे का ऑर्डर नहीं देते, बल्कि उन्हें सही व गलत, सत्य व असत्य के बारें में ज्ञान दृष्टि से समझाया। विद्यार्थियों व युवाओं को अर्जुन की तरह गीता का अनुसरण कर देश विकास व विश्व गुरू भारत की दिषा में अपना योगदान देने का आह्वान किया। संस्थान की निदेशिका प्रो. बिंदू शर्मा ने सभी वक्ताओं का स्वागत करते हुए कहा कि यह कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के लिए गौरव की बात है कि अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्लेनरी सत्र में इस बार महान एवं वरिष्ठ वक्ताओ का आना संभव हुआ है। कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के इस मंच पर आने से विश्वविद्यालय का गौरव बढ़ा है। संगोष्ठी के संयोजन सचिव प्रो. तेजेंद्र शर्मा ने सभी का आभार प्रकट करते हुए कहा कि अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्लेनरी सत्रों ने इस संगोष्ठी की गरिमा को बढ़ा दिया है। लोगों की दिलचस्पी भगवतगीता पर होने वाले इस विचार विमर्श में बढ़ी है। जिसका फायदा देश की युवाशक्ति को होगा। सत्र संचालक डा. अशोक कुमार ने सभी वक्ताओं का परिचय दिया। इस मौके पर डीन एकेडमिक प्रो. मंजूला चैधरी, प्रो. डीके वर्मा, प्रो. एनके माटा, डा. मधुदीप, रोमा सिंह, डा. आबिद सहित सभी शिक्षक, शोधार्थी व विद्यार्थी शामिल रहे।

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